Sunday, December 9, 2012

भ्रष्टाचार क्यों?

भारत एक सनातन यात्रा
 
 
भ्रष्टाचार क्यों?
भ्रष्टाचार के होने के कारण अस्तित्व में छिपे हैं। यह कोई सिद्धांतों की बात नहीं है। और नेतागण चिल्लाते रहे हैं कि हम भ्रष्टाचार को मिटा देंगे, वे चाहे जो इंतजाम करें। वे जो भी इंतजाम करेंगे वही भ्रष्टाचारी हो जाएगा। और मजा तो यह है कि वह जो नेता जितने जोर से मंच पर चिल्लाते हैं कि भ्रष्टाचार मिटा देंगे, वे उस मंच तक बिना भ्रष्टाचार के पहुंच नहीं पाते। जहां से भ्रष्टाचार मिटाने का व्याख्यान देना पड़ता है, उस मंच तक पहुंचने के लिए भ्रष्टाचार की सीढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं
जिस देश में इतनी गरीबी हो उस देश में सदाचार हो सकता है, यह चमत्कार होगा। यह संभव नहीं है। जहां जीना इतना कठिन हो, वहां आदमी ईमानदार रह सकेगा, यह मुश्किल है। हां, एकाध आदमी रह सकता है। कोई संकल्पवान रह सकता है, लेकिन इतना संकल्प सबके पास नहीं है और इसके लिए उन्हें दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता।

जिंदगी में जहां जीने के लिए बेमानी शर्त बनाना पड़ता हो-यहां इतने बड़े कमरे में हम सारे लोग बैठे हैं और यहां बीस-पच्चीस रोटी हों और हम सब भूखे हों तो आप सोचते हैं, शिष्टाचार बचेगा? और वह शिष्टाचार, अगर नहीं बचा, तो क्या इस भवन को आप गाली देंगे कि यह भवन भ्रष्टाचार पैदा करवा रहा है? भ्रष्टाचार भवन पैदा नहीं करवा रहा है! भ्रष्टाचार! पच्चीस रोटियां और पच्चीस सौ खाने वाले भूखे हैं, इनकी वजह से भ्रष्टाचार पैदा हो रहा है। इस कमरे का कोई कसूर नहीं है, भवन का कोई कसूर नहीं, यह पूंजीवाद कि व्यवस्था का कोई कसूर नहीं है कि भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार का कारण दूसरा है। भ्रष्टाचार का कारण यह है कि भूख ज्यादा है, रोटी कम है। नंगे शरीर ज्यादा हैं, कपड़े कम हैं। आदमी ज्यादा हैं, मकान कम हैं। जीने की सुविधा कम है, और जीने वाले रोज बढ़ते चले जा रहे हैं। इसके बीच जो तनाव पैदा होगा, वह भ्रष्टाचार ले आएगा। इस भ्रष्टाचार को कोई नेता नहीं मिटा सकता। क्योंकि नेतागण सोचते हैं कि जैसे भ्रष्टाचार को मिटाना। वह जिस ढंग से सोचते हैं, कोई साधु-सेवक-समाज बना लेता है कि इससे हम भ्रष्टाचार मिटा देंगे।

कुछ ऐसा लगता है कि हम जिंदगी के गणित को सीधा देखने से चूक ही जाते हैं। साधु-सेवक-समाज बनाने से क्या भ्रष्टाचार मिटा दोगे? ये साधु जाकर सारे मुल्क को समझायेंगे कि भ्रष्टाचार मत करो। तो क्या भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा? यह समझाने का मामला है कि भ्रष्टाचार मत करो!

यह समझाने कि बात होती तो हम करते ही न, यह समझाने की बात नहीं है। यह जीने का-’एक्जिस्टेन्शियल’ प्रश्न है। यहां अस्तित्व खतरे में है। यह प्रवचन से हल होने वाला नहीं है कि सारे हिंदुस्तान के साधु गांव-गांव जाकर समझाएं कि भ्रष्टाचार मत करो। तो बस भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा। यहां कोई शिक्षा कि कमी नहीं है और न प्रवचनों कि कमी है। और यह न होगा कि बच्चों को गीता और रामायण कंठस्थ करवा दें तो भ्रष्टाचार मिट जाएगा कि नैतिक शिक्षा दे दें, हर स्कूल में। पढ़ लेंगे गीता को, रामायण को, भ्रष्टाचार नहीं मिट जाएगा। क्योंकि भ्रष्टाचार के होने के कारण अस्तित्व में छिपे हैं। यह कोई सिद्धांतों की बात नहीं है। और नेतागण चिल्लाते रहे हैं कि हम भ्रष्टाचार को मिटा देंगे, वे चाहे जो इंतजाम करें। वे जो भी इंतजाम करेंगे वही भ्रष्टाचारी हो जाएगा। और मजा तो यह है कि वह जो नेता जितने जोर से मंच पर चिल्लाते हैं कि भ्रष्टाचार मिटा देंगे, वे उस मंच तक बिना भ्रष्टाचार के पहुंच नहीं पाते। जहां से भ्रष्टाचार मिटाने का व्याख्यान देना पड़ता है, उस मंच तक पहुंचने के लिए भ्रष्टाचार की सीढियाँ पार करनी पड़ती हैं।

अब यह इतना जाल है कि सिद्धांतों से होनेवाला नहीं है। इस जाल की बुनियादी जड़ को पकड़ना पड़ेगा और अगर हम जड़ को पकड़ लें तो बहुत चीजें साफ हो जाएं। हमें मान लेना चाहिए कि आज के भारत में ईमानदार की बात करना बेकार है। न नेता को करना चाहिए, न साधु को करना चाहिए। हमें मान लेना चाहिए कि बेईमानी नियम है। इसमें झंझट नहीं करनी चाहिए। इसमें झगड़ा खड़ा नहीं करना चाहिए। तब कम से कम बेईमानी सीधी साफ तो हो सकेगी। यानी मुझे आपकी जेब में हाथ डालना है तो मैं सीधा तो डाल सकूंगा। नाहक आप सोयें और रात में आपके घर मैं आऊं, जेब में हाथ डालूं और फिर सुबह मंदिर जाऊं और व्याख्यान करूं कि चोरी करना पाप है। यह सब जाल की जरुरत नहीं है। हिंदुस्तान में बेईमानी जो है आज की समाज-व्यवस्था में, अगर न हो, तो या तो समाज-व्यवस्था टूट जाये, या तो हम मर जाएं। बेईमानी इस वक्त लुब्रिकेटिंग का काम कर रही है। वह लुब्रिकेशन है। वह जरा पहिये को तेल दे देती है और चलने लायक बना देती है। अगर यह मुल्क कसम खा ले ईमानदार होने की, तो मर जाये। वह जिंदा नहीं रह सकता है और जिन लोगों ने कसम खा ली ईमानदारी की उनसे आप पूछ लो कि वे जिंदा हैं कि मर गए। उनकी आवाज शायद ही निकले, क्योंकि वे मर ही चुके होंगे।

भ्रष्टाचार हमारी इस समाज-व्यवस्था में, हमारी इस समाज कि दीनता और दरिद्रता में, हमारे समाज की इस भुखमरी हालत में इस यंत्रविहीन अनौद्योगिक संपति शून्य समाज में अनिवार्यता है। इसमें चिल्लाने की कोई जरुरत नहीं है, न किसी को गाली देने की जरुरत है।

मैं जापान की छोटी-सी किताब पढ़ रहा था शिष्टाचार के नियमों की। तो उसमें लिखा हुआ है कि किसी आदमी से उसकी तनख्वाह न पूछें। तब बहुत हैरान हुआ कि क्या मामला है। हमसे बड़े अविकसित मालूम होते हैं जापानी। हम तो तनख्वाह ही नहीं पूछते, यह भी पूछते हैं उससे कि कुछ ऊपर से भी मिलता है कि नहीं। यह बड़े पक्के गंवार मालूम पड़ते हैं। इनको इतना पता नहीं कि भारत जैसे सुसंस्कृत और सभ्य देश वहां आम तनख्वाह के ऊपर क्या मिलता है, यह भी पूछते हैं। न केवल पूछते हैं बल्कि बताने वाला बताता ही है कुछ भी नहीं मिलता है, थोड़ा ही मिलता है, कुछ ज्यादा नहीं मिलता। उस किताब में नीचे नोट लिखा हुआ है कि किसी से तनख्वाह पूछना अपमानजनक हो सकता है, क्योंकि हो सकता है उसकी तनख्वाह कम हो और उसे चार आदमियों के सामने तनख्वाह बतानी पड़े, या हो सकता है कि उसे इतना संकोच लगे कि उसे व्यर्थ झूठ बोलना पड़े, जितनी उसकी तनख्वाह न हो उतनी बतानी पड़े, इसलिए तनख्वाह नहीं पूछनी चाहिए।

इस मुल्क में हमें आज कि मौजूदा हालत में भ्रष्टाचार, रिश्वत इतनी बात नहीं पूछनी चाहिए। यह अशिष्टता है, घोर अशिष्टता है। यह सीधी साफ बात है, यह स्वीकृति होनी चाहिए। इसमें कोई झगड़ा नहीं करना चाहिए। हां, रह गई बात यह कि अगर हम इसे स्वीकार कर लें तो हम इसे मिटा सकते हैं। इसे हम स्वीकार कर लें तो इसकी बुनियादी जड़ों में जा सकते हैं कि बात क्या है। कोई आदमी अपनी तरफ से बुरा नहीं होना चाहता। बुराई सदा ही मजबूरी की हालत में पैदा होती है। हां, कुछ लोग होंगे जिनको बुरा होने में मजा आता है, वे रुग्ण हैं। उनकी चिकित्सा हो सकती है। लेकिन अधिकतम लोग बुरा होने के लिए बुरा नहीं होते। जब जीना मुश्किल हो जाता है तब बुराई को साधन की तरह पकड़ते हैं।

जब इतनी बुराई है तो इस बात की यह खबर है कि मुल्क इस जगह खड़ा है जहां जीना असंभव हो गया है। इसलिए जीने को हम कैसे संभव बनायें? कैसे सरल बनायें? कैसे समृद्ध बनायें? यह सोचना चाहिए। भ्रष्टाचार कैसे मिटायें यह सोचिये ही मत। आप सोचिये कि जीवन को कैसे समृद्ध बनाएं। जीवन को कैसे सरल बनाएं। कैसे जीवन को गतिमान करें। जीवन कैसे रोज रोज समृद्धि के नए शिखरों पर पहुंचे, इसकी फिक्र करिए। भ्रष्टाचार वगैरह की व्यर्थ बकवास में मत पड़े रहिये।
-ओशो
भारत के जलते प्रश्न
प्रवचन- 14 से संकलित
 

मौत पीछा न छोड़ेगी...

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मौत पीछा न छोड़ेगी...
यदि तुम ठीक छाया की ओर बढ़ो, जहां धूप न हो, तो परछाई गायब हो जायेगी क्योंकि परछाई धूप या रोशनी के कारण ही बनती है। वह सूर्य की किरणों की अनुपस्थिति है। यदि तुम एक वृक्ष की छाया तले बैठ जाओ, तो परछाई लुप्त हो जायेगी...
एक बहुत प्यारी सूफ़ी कहानी हैः

एक बादशाह ने एक दिन सपने में अपनी मौत को आते हुए देखा। उसने सपने में अपने पास खड़ी एक छाया देख, उससे पूछा-'तुम कौन हो? यहां क्यों आयी हो?'

उस छाया या साये ने उत्तर दिया-मैं तुम्हारी मौत हूं और मैं कल सूर्यास्त होते ही तुम्हें लेने तुम्हारे पास आऊंगी।' बादशाह ने उससे पूछना भी चाहा कि क्या बचने का कोई उपाय है, लेकिन वह इतना अधिक डर गया था कि वह उससे कुछ भी न पूछ सका। तभी अचानक सपना टूट गया और वह छाया भी गायब हो गयी। आधी रात को ही उसने अपने सभी अक्लमंद लोगों को बुलाकर पूछा-'इस स्वप्न का क्या मतलब है, यह मुझे खोजकर बताओ।' और जैसा कि तुम जानते ही हो, तुम बुद्धिमान लोगों से अधिक बेवकूफ कोई और खोज ही नहीं सकते। वे सभी लोग भागे-भागे अपने-अपने घर गये और वहां से अपने-अपने शास्त्र साथ लेकर लौटे। वे बड़े-बड़े मोटे पोथे थे। उन लोगों ने उन्हें उलटना-पलटना शुरू कर दिया और फिर उन लोगों में चर्चा-परिचर्चा के दौरान बहस छिड़ गयी। वे अपने-अपने तर्क देते हुए आपस में ही लड़ने-झगड़ने लगे।

उन लोगों की बातें सुनकर बादशाह की उलझन बढ़ती ही जा रही थी। वे किसी एक बात पर सहमत ही नहीं हो पा रहे थे। वे लोग विभिन्न पंथों के थे। जैसा कि बुद्धिमान लोग हमेशा होते हैं, वे स्वयं भी स्वयं के न थे।

वे उन सम्प्रदायों से सम्बन्ध रखते थे, जिनकी परम्पराएं मृत हो चुकी थीं। उनमें एक हिन्दू, दूसरा मुसलमान और तीसरा ईसाई था। वे अपने साथ अपने-अपने शास्त्र लाये थे और उन पोथों को उलटते-पलटते, वे बादशाह की समस्या का हल खोजने की कोशिशों पर कोशिशें कर रहे थे। आपस में तर्क-विर्तक करते-करते वे जैसे पागल हो गये। बादशाह बहुत अधिक व्याकुल हो उठा क्योंकि सूरज निकलने लगा था और जिस सूर्य का उदय होता है, वह अस्त भी होता है क्योंकि उगना ही वास्तव में अस्त होना है। अस्त होने की शुरुआत हो चुकी है। यात्रा शुरू हो चुकी थी और सूर्य डूबने में सिर्फ बारह घंटे बचे थे।

उसने उन लोगों को टोकने की कोशिश की, लेकिन उन लोगों ने कहा-'आप कृपया बाधा उत्पन्न न करें। यह एक बहुत गम्भीर मसला है और हम लोग हल निकालकर रहेंगे।'

तभी एक बूढ़ा आदमी-जिसने बादशाह की पूरी उम्र खिदमत की थी-उसके पास आया और उसके कानों में फुसफुसाते हुए कहा-'यह अधिक अच्छा होगा कि आप इस स्थान से कहीं दूर भाग जायें क्योंकि ये लोग कभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे नहीं और तर्क-वितर्क ही करते रहेंगे और मौत आ पहुंचेगी। मेरा आपको यही सुझाव है कि जब मौत ने आपको चेतावनी दी है, तो अच्छा यही है कि कम-से-कम आप इस स्थान से कहीं दूर सभी से पीछा छुड़ाकर चले जाइए। आप कहीं भी जाइयेगा, बहुत तेजी से।' यह सलाह बादशाह को अच्छी लगी-'यह बूढ़ा बिल्कुल ठीक कह रहा है। जब मनुष्य और कुछ नहीं कर सकता, वह भागने का, पीछा छुड़ाकर पलायन करने का प्रयास करता है।'

बादशाह के पास एक बहुत तेज दौड़ने वाला घोड़ा था। उसने घोड़ा मंगाकर बुद्धिमान लोगों से कहा-'मैं तो अब कहीं दूर जा रहा हूं और यदि जीवित लौटा, तो तुम लोग तय कर मुझे अपना निर्णय बतलाना, पर फिलहाल तो मैं अब जा रहा हूं।'

वह बहुत खुश-खुश जितनी तेजी से हो सकता था, घोड़े पर उड़ा चला जा रहा था क्योंकि आखिर यह जीवन और मौत का सवाल था। वह बार-बार पीछे लौट-लौटकर देखता था कि कहीं वह साया तो साथ नहीं आ रहा है, लेकिन वहां स्वप्न वाले साये का दूर-दूर तक पता न था। वह बहुत खुश था, मृत्यु पीछे नहीं आ रही थी और उससे पीछा छुड़ाकर दूर भागा जा रहा था।

अब धीमे-धीमे सूरज डूबने लगा। वह अपनी राजधानी से कई सौ मील दूर आ गया था। आखिर एक बरगद के पेड़ के नीचे उसने अपना घोड़ा रोका। घोड़े से उतरकर उसने उसे धन्यवाद देते हुए कहा-'वह तुम्हीं हो, जिसने मुझे बचा लिया।'

वह घोड़े का शुक्रिया अदा करते हुए यह कह ही रहा था कि तभी अचानक उसने उसी हाथ को महसूस किया, जिसका अनुभव उसने ख्वाब में किया था। उसने पीछे मुड़कर देखा, वही मौत का साया वहां मौजूद था।

मौत ने कहा-'मैं भी तेरे घोड़े का शुक्रिया अदा करती हूं, जो बहुत तेज दौड़ता है। मैं सारे दिन इसी बरगद के पेड़ के नीचे खड़ी तेरा इन्तजार कर रही थी और मैं चिन्तित थी कि तू यहां तक आ भी पायेगा या नहीं क्योंकि फासला बहुत लंबा था। लेकिन तेरा घोड़ा भी वास्तव में कोई चीज है। तू ठीक उसी वक्त पर यहां आ पहुंचा है, जब तेरी जरूरत थी।'

तुम कहां जा रहे हो? तुम कहां पहुंचोगे? सारी भागदौड़ और पलायन आखिर तुम्हें बरगद के पेड़ तक ही ले जायेगी। और जैसे ही तुम अपने घोड़े या कार को धन्यवाद दे रहे होगे, तुम अपने कंधे पर मौत के हाथों का अनुभव करोगे। मौत कहेगी-'मैं एक लम्बे समय से तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रही थी। अच्छा हुआ, तुम खुद आ गये।'

और प्रत्येक व्यक्ति ठीक समय पर ही आता है। वह एक क्षण भी नहीं खोता। प्रत्येक व्यक्ति ठीक वक्त पर ही पहुंचता है, कोई भी कभी देर लगाता ही नहीं। मैंने सुना है कि कुछ लोग वक्त से पहले ही पहुंच गये, लेकिन मैंने यह कभी नहीं सुना कि कोई देर से आया हो। कुछ लोग, जो समय से पहले पहुंचे थे, वह लोग अपने चिकित्सकों की मेहरबानी के कारण।
अपनी असफलता की वजह उसने यह ठहराई

कि वह काफी तेजी से नहीं दौड़ रहा था।

इसीलिए वह बिना रुके तेज और तेज दौड़ने लगा।

यहां तक कि अन्त में वह नीचे गिर पड़ा और मर गया।

वह यह समझने में असफल रहा

कि यदि उसने सिर्फ किसी पेड़ या किसी छांव की ओर कदम रखे होते,

तो उसकी छाया बनती ही नहीं

और यदि वह उसके नीचे बैठकर स्थिर हो ठहर गया होता,

तो न पैरों के कदम उठते और उनकी ध्वनि होती।

यह बहुत आसान था-सबसे अधिक आसान।

यदि तुम ठीक छाया की ओर बढ़ो, जहां धूप न हो, तो परछाई गायब हो जायेगी क्योंकि परछाई धूप या रोशनी के कारण ही बनती है। वह सूर्य की किरणों की अनुपस्थिति है। यदि तुम एक वृक्ष की छाया तले बैठ जाओ, तो परछाई लुप्त हो जायेगी।

वह यह समझने में असफल रहा

कि यदि उसने सिर्फ किसी पेड़ या किसी छांव की ओर कदम रखे होते,

तो उसकी परछाई बनती ही नहीं। वह गायब हो जाती।

इस छांव को कहते है--मौन। इस छांव को कहते हैं-आंतरिक शान्ति। मन की सुनो ही मत, बस केवल मौन की छांव में सरक जाओ, अपने अंदर गहरे में उतर जाओ, जहां सूर्य की कोई किरण प्रविष्ट नहीं हो सकती, जहां परम शान्ति है।
-ओशो
पुस्तकः सत्य-असत्य
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. व पुस्तक में उपलब्ध है










बाल जगत
 
 
कला का इतिहास
"बचपन स्वर्ग जैसा क्यों होता है? क्योंकि बच्चा रहस्य के जगत में जीता है। उसके लिए हर बात रहस्यपूर्ण है। यहां तक कि सूर्य के प्रकाश में झूमते वृक्ष कि छाया भी रहस्यपूर्ण है। काव्यात्मक है। एक साधारण सा फूल, एक घास का फूल भी इतना रहस्यपूर्ण होता है क्योंकि यह पूरे जीवन को अभिव्यक्त करता है। वृक्षों में बहती हवा, उसके गीत, घाटियों का संगीत, पानी में बनने वाले अक्स, हर बात बच्चे के लिए रहस्यपूर्ण है, अज्ञात है। वह प्रसन्न होता है। इसे स्मरण रखो-तुम्हारी प्रसन्नता तुम्हारे रहस्य के अनुपात में होती है। कम रहस्य, कम प्रसन्नता। ज्यादा रहस्य, ज्यादा प्रसन्नता।"
ओशो
शिक्षा ओशो की दृष्टि में
कला मानव मन की ऐसी रचनात्मक अभिव्यक्ति है जिसके माध्यम से वास्तविक और काल्पनिक स्थितियों को चित्रित किया जाता है। उसकी सुदंरता को कैनवास, पेपर, पत्थर और दीवारों पर उकेरा जाता है। आमतौर पर जब हम कला की बात करते हैं तब उसका अभिप्राय, वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला से होता है। कला विश्व की ऐसी कलात्मक और अनूठी पहचान है जिससे किसी भी देश की संस्कृति और सभ्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है। कला का कलात्मकता इससे परलक्षित होती है कि कलाकार और हस्तशिल्पी अपनी रचनात्मक अंगुलियों से वही दिखाता है जो वास्तव में सच होता है।

कला की उत्पत्ति के चिन्ह हमें गुफाओं और शिलाखण्डों पर बनी विशेष आकृति में देखने को मिले। कला को वास्तविक और मूर्त रूप कलाकारों की कल्पना ने दिया। जिन्होंने इसको दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा दिया। आधुनिक कला को हम मनुष्य की कलापूर्ण प्रवृत्ति का साक्षात् प्रमाण मानते है। जिसकी सुंदरता दुनिया के विभिन्न चित्रकारों ने अपनी कला से प्रकट की है। प्रकृति और कला का नाता बहुत ही प्राचीन है। इनका अस्तित्व ही मनुष्य को जीवंत बनायें हुए है।
कला की शुरुआत कब, कहां और कैसे हुई। इसकी सही और सटीक जानकारी इतिहास के पन्नों पर अंकित नहीं है। लेकिन ऐसा माना जाता है कि कला, पेंटिग और चित्रकला का विकास लगभग एक सौ हजार साल पुराना है।



आधुनिक कला की शुरुआत विन्सेन्ट वैन गॉग, पॉल सिजैन, पॉल गॉगुइन, जॉर्जेस श्योरा और हेनरी डी टूलूज लॉट्रेक जैसे ऐतिहासिक चित्रकारों ने की। ये सभी आधुनिक कला के विकास को महत्वपूर्ण मानते थे. 20वीं सदी की शुरुआत में हेनरी मैटिस और कई युवा कलाकारों, जिनमें पूर्व-घनवादी जॉर्जेस ब्रैक्यू, आंद्रे डेरैन, रॉल डफी और मौरिस डी व्लामिंक शामिल थे। इनके जीवंत बहु-रंगी, भावनात्मक परिदृश्य और आकार चित्रकला जिसे आलोचकों ने फॉविज्म का नाम दिया। हेनरी मैटिस के द डांस के दो संस्करणों ने उनके करियर और आधुनिक चित्रकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मैटिस के परिलक्षित कला के साथ प्रारंभिक आकर्षण को दर्शाता है। नीले-हरे रंग की पृष्ठभूमि पर आकृतियों में उपयोग किए गए बेहतरीन उग्र रंग और नृत्य कलाओं की तालबद्ध प्रस्तुति भावनात्मक और हेडोनिजम की भावनाओं को व्यक्त करता

प्रारंभ में टुलुज लॉट्रेक, गॉगुइन और 19वीं सदी के अन्य नवकलाकारों से प्रभावित पैब्लों पिकासो ने अपने पहले घनवादी पेंटिंग को सीजैन के इस विचार के आधार पर बनाया था कि प्रकृति की सभी कलाकृतियां तीन ठोस आकार घन, गोला और शंकु में समाहित किए जा सकते हैं। लेस डेमोइसेलस डेएविगनन 1907 पेंटिंग के साथ, पिकासो ने नाटकीय रूप से एक नया और स्वाभाविक चित्र बनाया। विश्लेषणात्मक घनवाद को पिकासो और जॉर्जेस ब्राक्यू ने मिलकर विकसित किया था, जिसका उदाहरण हमें 1908 से 1912 के मध्य वायलिन और कैंडलस्टिकग, पेरिस में देखने को मिला।

विश्लेषणात्मक घनवाद, ब्राक्यू, पिकासो, फर्नार्ड लेगर, जुएन ग्रिस, मार्शल डुचैम्प और 1920 के कई अन्य कलाकारों द्वारा किए जाने वाले कृत्रिम घनवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति थी। कृत्रिम घनवाद भिन्न आकृतियों, सतहों, कॉलेज तत्वों, पेपर कॉले और कई मिश्रित विषयों को प्रस्तुत करके चित्रित किया जाता है। आधुनिक कलाकारों ने देखने के नए तरीकों और सामग्रियों और कला के कार्यों की प्रवृति पर नए विचारों के साथ नये और आधुनिकतम प्रयोग किए। साथ ही कल्पनात्मकता की ओर झुकाव आधुनिक कला की विशेष विशेषता रही है।



कला के इतिहास और विकास की यात्राः

32,000 ईसा पूर्व अफ्रीका में पत्थरों पर नक्काशी की कला की शुरुआत हुई। वही इस कला का प्रारंभ भी माना जाता है। इसके अलावा पेन्टिंग कला करने के प्रतीक अफ्रीका और यूरोप की गुफाओं में बड़ी मात्रा में देखने को मिले। आज भी इन देशों की गुफाओं और पहाड़ों में चित्रकला और नक्काशी के अवशेष जीवित हैं। हालांकि उस समय की पेंटिंग में उतना आकर्षण नहीं था जितना आधुनिक युग में होता है। लेकिन उन कलाकारों की कार्यक्षमता के अनुसार यह कला उनके दक्षता और अनुभव को प्रकट करती थी। पेन्टिंग में यह भी साफ झलकता था कि उस समय के जानवर वास्तविकता में कैसे प्रतीत होते थे।

9000 ईसा पूर्व जब लोग खानाबदोश रहने की बजाय गांवों और समूहों में रहने लगे। तब उनके जीवनशैली में आये इस बदलाव ने कला के क्षेत्र में भी चार चांद लगा दिये। एक स्थान पर रहने के कारण उन्होंने अपनी कला से बड़ी-बडी स्थाई मूर्तिया बनानी शुरू कर दिया। जिससे उन्हें बड़ी आकार की मूर्तियां बनाने में भी आसानी होने लगी। पश्चिमी एशिया और इजिप्ट में सबसे पहले मिट्टी और धातु की विशाल मूर्ति बनाई गई। कला में आये इस बदलाव ने मिट्टी के बर्तनों को भी सजावटी आकार प्रदान कर दिया।

3000 ईसा पूर्व के आस-पास लोगों ने धातु की वस्तुओं पर काम करना सीख लिया था। जिसके कारण भारत में पहली धात्विक और सूक्ष्म मूर्ति बनायी गयी। इसी काल में भारत और और ग्रीस के लोगों ने इस क्षेत्र में हाथ अजमाने शुरू कर दिये। उनके बनाये नमूने सुदंरता के कारण जीवंत प्रतीत होते थे।

1100 ईसा पूर्व पश्चिमी एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में ऐसा समय आया जब कला का चमकता सितारा धूमिल होने लगा कारण साफ था कि उस समय लोग कला में इतना माहिर नहीं थे। जिसका सीधा असर कला पर पड़ा और वह अपने अस्तित्व से डगमगाने लगी। कला के इस काले अध्याय के बाद कलाप्रेमियों ने अपने कार्य रूचि से पेन्टिंग में नयी जान फूंक दी।

ग्रीस में प्राचीन और पारंपरिक मूर्तियां बननी शुरू हुई और फूलों के गुलदानों पर लाल और काले रंग की चित्रकारी होने लगी। इटली में, इट्रस्केन लोग पत्थरों और मिट्टी की मूर्तियां बनाने लगे। साथ ही स्वयं के मिट्टी के बर्तनों पर भी चित्रकारी करने लगे। पश्चिमी एशिया के महाराजा ने नक्काशी को अपने महल की दीवारों पर बनवाई थी। ताकि इन कलाओं से उसका महल सुदंरता का आकार ले ले।

325 ईसा पूर्व में जब सिकंदर महान ने पश्चिम एशिया को जीता, तब एक देश से दूसरे देश के बीच में कलात्मक विचारों और कला का विनिमय हुआ। लोगों पूरे साम्राज्य में घूम-घूमकर अपने विचारों और कलाओं का आदान प्रदान किया।

इसका लाभ भारत में दिखा जब आदान-प्रदान के कारण देश में पहली ग्रीक मूर्ति का निर्माण हुआ। ग्रीक की इस तकनीकि का इस्तेमाल करके भारतीय मूर्तिकारों ने बुद्ध की प्रतिमा को बनाया। जिससे बौद्ध धर्म को भी प्रचार के क्षेत्र में एक बल मिला। इसके कुछ समय बाद बौद्धधर्मियों ने चीन की यात्रा शुरू की और वहां से पत्थर की मूर्तियों को अपने साथ ले आये। चीन के कलाकारों ने भी पत्थरों की यथार्थ आकार की मूर्तियों को तराशना शुरू कर दिया। इस तरह से कला के विस्तार ने पूरे विश्व में फैलने की रफ्तार पकड़ ली।

200 ईसा के बाद रोमन चित्रकारों ने अपने काम में नए-नए प्रयोग करने आरंभ कर दिए। मूर्तियों को इस तरह से तराशने लगे कि वास्तविक और काल्पनिक कला में फर्क करना कठिन हो जाता था। मूर्तियों में बड़े आकार की आंखे होती थी। जो उनकी शक्ति और उर्जा को दर्शाती थी।

450 ईसा में कला के क्षेत्र में एक और काला अध्याय उस समय जुड़ गया जब रोम और सेसेशियन साम्राज्य का पतन होने लगा। लोगों में गरीबी और भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी जिसका सीधा प्रभाव मूर्तिकारों और चित्रकारों पर भी पड़ा। वो अपनी कला की गाड़ी का पहिया आगे खींचनें में असमर्थ हो गये। कुछ सालों तक इस क्षेत्र में कोई उन्नति देखने को नहीं मिली। लेकिन दूसरी तरफ चीन में कला ने तेजी से अपनी जड़े फैलानी शुरू कर दी, कलाकरों ने अपनी चित्रकारी और पेंटिग का हुनर, नये आविष्कार हुए कागजों पर करना प्रारंभ कर करने लगे थे।

जब पश्चिमी कलाकारों ने दोबारा कला में हाथ अजमाने शुरू किये। तब उन्होंने अपने काम में नित नये प्रयोग किये। मध्यकालीन कला में इस्लाम और ईसाई धर्मों का अहम योगदान देखने को मिला।

शुरुआत में मध्यकालीन या रोम के पुराने कलाकारों को लोगों और मकानों की आकृतियों के प्रतीकात्मक और साहसिक भावनाओं वाले चित्र बनाना अधिक पसंद था। लेकिन इस युग के बाद के कलाकार गिओटटो और डोनाटेल्लो ने नवीन मध्यकालीन पेंटिंग कला को प्राचीन ग्रीक और रोमन सभ्यता के साथ मिलाकर बनाने लगे। जिसे हम प्रत्येक देश की संस्कृति कला और सभ्यता में देख सकते है।

पेटिंग का इतिहास अगले अंक में....





ध्यान विधि
 
 
अनुभव करो-मैं हूं
शिव ने कहाः हे कमल नयनी, मधुर स्पर्शी! गाते हुए, देखते हुए, स्वाद लेते हुए यह बोध बनाए रहो कि मैं हूं, और शाश्वत जीवन को खोज लो...
यह विधि कहती है कि कुछ भी करते हुए-गाते हुए, देखते हुए, स्वाद लेते हुए-सजग रहो कि 'तुम हो' और शाश्वत जीवन का आविष्कार कर लोः और अपने भीतर ही प्रवाह को, उर्जा को, शाश्वत जीवन को आविष्कृत कर लो। लेकिन हमें अपना ही बोध नहीं है।

पश्चिम में गुरजिएफ ने आत्म-स्मरण का प्रयोग एक बुनियादी विधि के रूप में किया। वह आत्म-स्मरण इसी सूत्र से निकलता है। और गुरजिएफ की पूरी व्यवस्था इसी एक सूत्र पर आधारित हैः 'तुम कुछ भी करते हुए अपने को स्मरण रखो।' यह बहुत कठिन है। यह सरल मालूम होता है लेकिन तुम भूलते रहोगे। तीन या चार सैंकेड के लिए भी तुम अपना स्मरण नहीं रख सकते। तुम्हें लगेगा कि तुम स्मरण कर रहे हो और अचानक तुम किसी अन्य विचार में गति कर चुकोगे। अगर यह विचार भी उठा कि "ठीक, मैं तो अपना स्मरण कर रहा हूं," तो तुम चूक गए, क्योंकि यह विचार आत्म-स्मरण नहीं है।

आत्म-स्मरण में कोई विचार नहीं होगा; तुम बिल्कुल रिक्त होओगे। और आत्म-स्मरण कोई मानसिक प्रक्रिया नहीं है। ऐसा नहीं कि तुम कहो, "हां, मैं हूं"। "हां, मैं हूं" कहने से तुम चूक गए। "मैं हूं" कहने से तुम चूक गए। "मैं हूं" यह एक बौद्धिक बात हो गई, एक मानसिक हो गई।

यह अनुभव करो कि "मैं हूं"। "मैं हूं" इन शब्दों को नहीं अनुभव करना है। उसे श्शब्द मत दो। बस अनुभव करो कि तुम हो। सोचो मत। अनुभव करो! प्रयोग करो। यह कठिन है, लेकिन तुम कृतसंकल्प होकर इस पर लगे ही रहो तो यह घटित होता है। टहलते हुए, स्मरण रखो कि तुम हो, और अपने होने को ही महसूस करो, किसी विचार या प्रत्यय को नहीं। बस अनुभव करो। मैं तुम्हारे हाथ को छुऊं, या अपना हाथ तुम्हारे सिर पर रखूः उसे शब्द मत दो। बस स्पर्श को अनुभव करो, और उस अनुभव करने में स्पर्श को ही नहीं, उसको भी अनुभव करो जिसे स्पर्श किया गया है। फिर तुम्हारी चेतना के दो फलक हो जाएंगे।

तुम वृक्षों के नीचे टहल रहे होः वृक्ष हैं, हवा है, सूरज उग रहा है। यह तुम्हारे चारों ओर का संसार है; तुम उसके प्रति सजग हो। एक क्षण को खड़े रहो, और फिर अचानक स्मरण करो कि 'तुम हो' लेकिन उसको शब्द मत दो। बस अनुभव करो कि तुम हो। यह निशब्द अनुभूति, एक क्षण के लिए ही सही, तुम्हें एक झलक दे जाएगी-एक झलक जो कोई एल एस डी तुम्हें नहीं दे सकती, एक झलक जो वास्तविक की है। एक क्षण के लिए तुम अपनी अंतस-सत्ता के केंद्र पर फेंक दिए जाते हो। तब तुम दर्पण के पीछे हो, तुम प्रतिबिंबो के जगत के पार चले गए; तुम अस्तित्वगत हो गये। और यह तुम किसी भी समय कर सकते हो। इसके लिए किसी विशेष स्थान और विशेष समय की जरूरत नहीं है। और तुम यह नहीं कह सकते कि, "मेरे पास समय नहीं है।" इसे तुम खाते समय कर सकते हो, नहाते समय कर सकते हो, चलते हुए या बैठे हुए कर सकते हो-किसी भी समय। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या कर रहे हो, तुम अचानक अपना स्मरण कर सकते हो, और फिर अपनी अंतस-सत्ता की उस झलक को जारी रखने की चेष्टा करो।

यह कठिन होगा। एक क्षण को तुम्हें लगेगा कि स्मरण आया और अगले ही क्षण तुम भटक जाओगे। कोई विचार प्रवेश कर जाएगा, कोई प्रतिबिंब तुम पर झलक जाएगा, और तुम प्रतिबिंब में उलझ जाओगे। लेकिन न दुखी होओ और न ही हताश होओ। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जन्मों से हम प्रतिबिंबों में उलझ रहे हैं। यह एक यंत्रवत प्रक्रिया बन गई है। तत्क्षण, स्वतः ही हम प्रतिबिंबों की ओर वापस लौटा दिये जाते हैं। लेकिन एक क्षण को भी तुम्हें झलक मिल जाए, तो शुरु करने के लिए पर्याप्त है। और वह पर्याप्त क्यों है? क्योंकि तुम्हें कभी भी दो क्षण एक साथ नहीं मिलेंगे। तुम्हारे साथ तो हमेशा केवल एक क्षण ही होता है। और यदि तुम्हें एक क्षण के लिए भी झलक मिल सके, तो तुम उसमें रह सकते हो। केवल प्रयास ही आवश्यकता है। एक सत्त प्रयास की आवश्यकता है।
-ओशो
ध्यान योगः प्रथम और अंतिम मुक्ति से संकलित
 
 

 

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  ओशो दर्शन
 
 
भक्ति और परमात्मा
भक्ति को समझने में, इस बात को जितना गहराई से समझ लो; उतना उपयोगी होगाः भक्ति परमात्मा की खोज नहीं हैः भक्ति परमात्मा के द्वारा मनुष्य की खोज है...
ज्ञान, कर्म, योग, उन सबका सार-सूत्र है प्रयास।

ज्ञान, कर्म, योग मनुष्य की चेष्टा पर निर्भर हैं; भक्ति परमात्मा के प्रसाद पर। स्वभावतः भक्ति अतुलनीय है। न कर्म छू सकता है उस ऊंचाई को, न ज्ञान, न योग।

मनुष्य का प्रयास ऊंचा भी जाए तो कितना? मनुष्य करेगा भी तो कितना? मनुष्य का किया हुआ मनुष्य से बड़ा नहीं हो सकता। मनुष्य जो भी करेगा, उस पर मनुष्य की छाप रहेगी। मनुष्य जो भी करेगा उस पर मनुष्य की सीमा का बंधन रहेगा।

भक्ति मनुष्य में भरोसा नहीं करती; भक्ति परमात्मा में भरोसा करती है। एक बहुत अनूठा भक्त हुआः बायजीद बिस्तामी। कहा है उसने, तीस साल तक निरंतर परमात्मा को खोजने के बाद, एक दिन सोचा तो दिखायी पड़ाः 'मेरे खोजे वह कैसे मिलेगा, जब तक वही मुझे न खोजता हो?' तब खोज छोड़ दी, और खोज छोड़कर ही उसे पा लिया।

तीस साल या तीस जन्मों की खोज से भी उसे पाया नहीं जा सकता, क्योंकि खोजेंगे तो हम-अंधे, अंधकार में डूबे, पापग्रस्त, सीमा में बंधे भूल चूकों का ढेर हैं हम। हम ही तो खोजेंगे उसे! रोशनी कहां है हमारे पास उसे खोजने को? हमारे पास हाथ कहां जो उसे टटोलें? कहां से लाएं हम वह दिल जो उसे पहचाने?

खोजी एक दिन पाता है कि नहीं, मेरे खोजे तू न मिलेगा, जब तक कि तू ही मुझे न खोजता हो। और बायजीद ने कहा है, जब उसे पा लिया तो जाना कि यह भी मेरी भ्रांति थी कि मैं उसे खोज रहा था। वही मुझे खोज रहा था।

जब तक परमात्मा ने ही तुम्हें खोजना शुरू न कर दिया हो, तुम्हारे मन में उसे खोजने की बात न उठेगी। यह बात बड़ी विरोधाभासी लगेगी, लेकिन बड़ा गहन सत्य है।

परमात्मा को केवल वे ही लोग खोजने निकलते हैं जिनको परमात्मा ने खोजना शुरू कर दिया। जो उसके द्वारा चुन ही लिये गये हैं, वे ही केवल उसे चुनते हैं। जो किसी भांति उनके हृदय में आ ही गया है, वे ही उसकी प्रार्थना में तत्पर होते हैं।

तुम्हारे भीतर से वही उसको खोजता है। सारा खेल उसका है। तुम जहां भी इस खेल में कर्ता बन जाते हो, वहीं बाधा खड़ी हो जाती है, वहीं दरवाजे बंद हो जाते हैं।

तुम खाली रहो, उसे खोजने दो तुम्हारे भीतर से, तो तत्क्षण इस क्षण भी उस महाक्रांति का आविर्भाव हो सकता है।

भक्ति को समझने में, इस बात को जितना गहराई से समझ लो; उतना उपयोगी होगाः भक्ति परमात्मा की खोज नहीं हैः भक्ति परमात्मा के द्वारा मनुष्य की खोज है।
मनुष्य हारकर समर्पण कर देता है, थककर समर्पण कर देता है, पराजित होकर झुक जाता है-कहता है, 'अब तू ही उठा तो उठा! अब तू ही सम्हाल तो सम्हाल! अब अपने से सम्हाला नहीं जाता! जो मै कर सकता था, किया; जो मैं हो सकता था, हुआ-लेकिन मेरे किये कुछ भी नहीं हो पाता! मेरा किया सब अनकिया हो जाता है। जितना सम्हालता हूं उतना ही गिरता हूं। जितनी कोशिश करता हूं कि ठीक राह पर आ जाऊं, उतना ही भटकता हूं। अब तू ही चल! जन्म तेरा है, जीवन तेरा है, मौत तेरी है-प्रार्थना मेरी कैसे होगी?

पहला सूत्र है आजः 'वह भक्ति, वह प्रेमरूपा भक्ति, कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है।'

श्रेष्ठता यही है कि वह अनंत के द्वारा तुम्हारी खोज है।

गंगा सागर की तरफ जाती है, तो ज्ञान, तो योग, तो कर्म। जब सागर गंगा की तरफ आता है, तो भक्ति।

भक्ति ऐसे है जैसे छोटा बच्चा पुकारता है, रोता है, मां दौड़ी चली आती है।

भक्ति बस तुम्हारा रुदन है!

तुम्हारे हृदय से उठी आह है!

भक्ति तुम्हारे जीवन की सारी खोज की व्यर्थता का निवेदन है। भक्ति तुम्हारे आंसुओं की अभिव्यक्ति है। तुम कहीं जाते नहीं, तुम जहां हो वहीं ठिठककर रह जाते हो। एक सत्य तुम्हारी समझ में आ जाता है कि तुम ही बस गलत हो; तुम गलत करते हो, ऐसा नहीं।

कर्मयोग कहता हैः तुम गलत करते हो, ठीक करो तो पहुंच जाओगे।

ज्ञानयोग कहता हैः तुम गलत जानते हो, ठीक जान लो, पहुंच जाओगे।

योगशास्त्र कहता हैः तुम्हें विधियां पता नहीं है, मार्ग पता नहीं है। विधियां सीख लो, मार्ग सीख लो, तकनीकि की बात है, पहुंच जाओगे।

भक्ति कहती हैः तुम ही गलत हो। न ज्ञान से पहुंचोगे, न कर्म से पहुंचोगे, न योग से पहुंचोगे। तुम तुमसे छूट जाओ, तो पहुंचना हो जाएगा। तुम न बचो तो पहुंचना हो जाएगा।

पहले तुम अज्ञान में थे, फिर तुम ज्ञान में भी रहोगे-फर्क बहुत न पड़ेगा। फर्क तो पड़ेगा, बहुत न पड़ेगा। फर्क ऐसा ही होगा कि जंजीरे लोहे की थीं, उन पर सोना मढ़ लोगे! कारागृह कुरूप था दुर्गंधयुक्त था, तुम सुगंधे छिड़क लोगे, रंग रोगन कर लोगे, कारागृह को सजा लोगे!
-ओशो
पुस्तकः भक्ति-सूत्र
प्रवचन नं. 7 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है।
अंधकार से प्रकाश की ओर...
आलोक के प्रति निराश होने का कोई कारण नहीं है। वस्तुतः अंधकार जितना घना होता है, प्रभात उतना ही निकट आ जाता है...
मैं मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूं। जैसे अंधेरी रात में किसी घर का दीया बुझ जाये, ऐसा ही आज मनुष्य हो गया है। उसके भीतर कुछ बुझ गया है।

पर- जो बुझ गया है, उसे प्रज्वलित किया जा सकता है।

और, मैं मनुष्य को दिशाहीन हुआ देख रहा हूं। जैसे कोई नाव अनंत सागर में राह भूल जाती है, ऐसा ही आज मनुष्य हो गया है। वह भूल गया है कि उसे कहां जाना है और क्या होना है?

पर, जो विस्मृत हो गया है, उसकी स्मृति को उसमें पुनः जगाया जा सकता है।

इसलिए, अंधकार है, पर आलोक के प्रति निराश होने का कोई कारण नहीं है। वस्तुतः अंधकार जितना घना होता है, प्रभात उतना ही निकट आ जाता है।

मैं देख रहा हूं कि सारे जगत में एक आध्यात्मिक पुनरुत्थान निकट है और एक नये मनुष्य का जन्म होने के करीब है। हम उसकी ही प्रसव-पीड़ा से गुजर रहे हैं।

पर, यह पुनरुत्थान हम सबके सहयोग की अपेक्षा में है। वह हम से ही आने को है, और इसलिए हम केवल दर्शक ही नहीं हो सकते हैं। उसके लिए हम सब को अपने में राह देनी है।

हम सब अपने आपको आलोक से भरें तो ही प्रभात निकट आ सकता है। उसकी संभावना को वास्तविकता में परिणत करना हमारे हाथों में है।

हम सब भविष्य के उस भवन की ईंटे हैं। और, हम ही हैं वे किरणे जिनसे भविष्य के सूरज का जन्म होगा। हम दर्शन नहीं, स्रष्टा हैं।

और, इसलिए वह भविष्य का ही निर्माण नहीं, वर्तमान का भी निर्माण है। वह हमारा ही निर्माण है। मनुष्य स्वयं का ही सृजन करके मनुष्यता का सृजन करता है। व्यक्ति ही समष्टि की इकाई है। उसके द्वारा ही विकास है और क्रांति है।

वह इकाई आप हैं।

इसलिए, मैं आपको पुकारना चाहता हूं। मैं आपको निद्रा से जगाना चाहता हूं।

क्या आप नहीं देख रहे हैं कि आपका जीवन एक बिलकुल बेमानी, निरर्थक और उबा देने वाली घटना हो गया है? जीवन ने सारा अर्थ और अभिप्राय खो दिया है। मनुष्य के भीतर प्रकाश न हो तो उसके जीवन में अर्थ नहीं हो सकता है।

मनुष्य के अंतस में ज्योति न हो, तो जीवन में आनंद नहीं हो सकता है।

हमें जो आज व्यर्थ बोझ मालूम हो रहा है, उसका कारण यह नहीं है कि जीवन ही स्वयं में व्यर्थ है। जीवन तो अनंत सार्थकता है, पर हम उस सार्थकता और कृतार्थता तक जाने का मार्ग भूल गये हैं। वस्तुतः हम केवल जी रहे हैं, और जीवन से हमारा कोई संबंध नहीं है। यह जीवन नहीं है। यह केवल मृत्यु की प्रतीक्षा है

और, निश्चय ही मृत्यु की प्रतीक्षा केवल एक ऊब ही हो सकती है। वह आनंद कैसे हो सकती है?

मैं आपसे यही कहने का आया हूं कि इस दुःख-स्वप्न से बाहर होने का मार्ग है, जिसे कि आपने भूल से जीवन समझ रखा है।

वह मार्ग सदा से है। अंधकार से आलोक ले जाने वाला मार्ग शाश्वत है।

वह तो है, पर हम उससे विमुख हो गये हैं। मैं आपको उसके सन्मुख करना चाहता हूं।

वह मार्ग ही धर्म है। वह मनुष्य के भीतर दीया जलाने का उपाय है। वह मनुष्य की दिशाहीन नौका को दिशा देना है।

महावीर ने कहा हैः

जरामरण वेगेणं, बुज्झमाणाण पाणिणं।

धम्मो दीवो पइट्ठा य, गई सरणमुत्तमं।।

-संसार के जन्म और मरण के वेगवाले प्रवाह में बहते हुए जीवों के लिए धर्म ही एकमात्र द्वीप है, प्रतिष्ठा है, गति है और शरण है।',

क्या आप उस प्रकाश के लिए प्यासे हैं, जो जीवन को आनंद से भर देता है? और, क्या आप उस सत्य के लिए अभीप्सु हैं, जो अमृत से संयुक्त कर देता है?

मैं तब आपको आमंत्रित करता हूं-आलोक के लिए और आनंद के लिए और अमृत के लिए। मेरे आमंत्रण को स्वीकार करें! केवल आंख ही खोलने की बात है, और आप एक नये आलोक के लोक के सदस्य हो जाते हैं।

और कुछ नहीं करना है, केवल आंख ही खोलनी है। और कुछ नहीं करना है, केवल जागना है और देखना है।

मनुष्य के भीतर वस्तुतः कुछ बुझता नहीं है-और न ही दिशा खो सकती है। वह आंख बंद किये हो तो अंधकार हो जाता है और सब दिशाएं खो जाती है। आंख बंद होने से वह सर्वहारा है और आंख खुलते ही सम्राट हो जाता है।

मैं आपको सर्वहारा होने के स्वप्न से, सम्राट होने की जागृति के लिए बुलाता हूं। मै आपकी पराजय को विजय में परिणत करना चाहता हूं, और आपके अंधकार को आलोक में, और आपकी मृत्यु को अमृत में-लेकिन क्या आप भी मेरे साथ इस यात्रा पर चलने का राजी हैं?''
-ओशो
ओशो साहित्य के प्रथम सोपानः
'साधना पथ' से सकंलित
जीवन ही प्रभु है...
अगर जिदंगी में बड़ी यात्रा करनी हो और जीवन को उन महान रास्तों पर ले जाना हो कि जीवन में महानता का सूर्य निकले, तब तो फिर बहुत कुछ करना पड़ेगा। खुद को मिटाना पड़ेगा, नया करना पड़ेगा; खुद को बदलना पड़ेगा। मेहनत की बात होगी, श्रम लगेगा, साधना लगेगी...
'जीवन ही है प्रभु इस संबंध में एक मित्र ने पूछा है, कैसे दिखाई पड़े फिर हमें कि जीवन ही प्रभु है। क्योंकि हमें तो चारों ओर दोष ही दिखाई पड़ते हैं। सबमें दोष दिखाई पड़ते हैं। 'क्यों दिखाई पड़ते है सबमें दोष?' इस संबंध में उन्होंने पूछा है।

प्रभु की खोज में एक सूत्र यह भी है, इसलिए इसे समझ लेना जरूरी है। निश्चित ही दोष दिखायी पड़ते हैं दूसरों में। कारण क्या है? कारण है सिर्फ एक--अपने अहंकार की तृप्ति। दूसरे में दोष दिखायी पड़ता है। दूसरे में दोष की खोज चलती है। उसका राज छोटा-सा है।

शायद यह घटना सुनी होगी कि अकबर ने एक दिन अपने दरबार में एक लकीर खींच दी और अपने दरबारियों से कहा, इसे बिना छुए, बिना मिटाए छोटी कर दो। वे वे बहुत हार गये परेशान हो गये। बीरबल उठा और उसने एक बड़ी लकीर खींच दी। उसी छोटी लकीर के पास एक बड़ी लकीर खींच दी। वह लकीर उतनी ही रही, न मिटायी, न छोटी की, लेकिन छोटी हो गयी।

जब हम दूसरे में दोष की तलाश में निकल जाते हैं, तब हम दूसरे की लकीर छोटी कर रहे है; ताकि हमें अपनी लकीर बड़ी मालूम पड़ने लगे। अपने को बड़ा देखने का सरलतम रास्ता यही है कि हम दूसरे को छोटा करके देखना शुरू कर दें। दूसरा रास्ता अपने को बड़ा करने का बहुत कठिन है, कि हम सच में अपने को बड़ा करें। उसमें अपने को छूना पड़ेगा, बदलना पड़ेगा, मिटाना पड़ेगा, नया करना पड़ेगा। सरल रास्ता यह है कि अपने को छूना ही न पड़े। अपने में कुछ फर्क ही न करना पड़े। हम जैसे हैं वैसे ही रहें, और बड़े हो जायें। तो सरल रास्ता यह है कि हमारे पास जो भी आते हो, उनको हम छोटा करके देखें।

अगर जिदंगी में बड़ी यात्रा करनी हो और जीवन को उन महान रास्तों पर ले जाना हो कि जीवन में महानता का सूर्य निकले, तब तो फिर बहुत कुछ करना पड़ेगा। खुद को मिटाना पड़ेगा, नया करना पड़ेगा; खुद को बदलना पड़ेगा। मेहनत की बात होगी, श्रम लगेगा, साधना लगेगी। इतनी मेहनत में जाने को कोई आतुर नहीं है, उत्सुक नहीं है। तो सरल तरकीब, शार्ट कट, निकटतम का रास्ता-जिसमें बिना कुछ किये मुफ्त में हम बड़े हो जाते हैं, वह एक ही है कि जो भी हमारे निकट आता हो, उसे हम छोटा करके देख लें। और जब हम तय ही कर लें किसी को छोटा करके देखने का तो दुनिया की कोई ताकत हमें रोक नहीं सकती। क्योंकि हमारी मर्जी की बात है। हम छोटा करके देख ही सकते हैं। हम किसी को भी छोटा करके देख सकते हैं।

लेकिन इस भांति जो हमारे भीतर बड़ा हो जाता है, वह हमारी आत्मा नहीं है। इस भांति जो हमारे भीतर बड़ा हो जाता है, उसी का नाम अहंकार है। अगर हम अपने को बदलेंगे तो आत्मा बड़ी हो जायेगी। इतनी बड़ी हो सकती है कि पूरे परमात्मा के साथ एक हो जाये। अपने को बदलेंगे तो आत्मा बड़ी होगी और अपने को बिना बदले अगर बड़ा करना है तो अहंकार बड़ा होगा, मैं बड़ा हो जाऊंगा।

आत्मा तो और छोटी हो जायेगी।

और यह भी ध्यान रहे, अहंकार जितना बड़ा होगा, आत्मा उतनी छोटी हो जाएगी और अहंकार जितना छोटा होगा, आत्मा उतनी बड़ी हो जाएगी।

तो जो व्यक्ति भी अपने अहंकार को बड़ा करने में लगा है, वह जाने अनजाने बहुत गहरे अर्थों में नुकसान उठा रहा है। हां, ऊपर उसे फायदे दिखायी पड़ेंगे। अहंकार को बड़ा करके देखेगा, दूसरे छोटे दिखायी पडेंगे, खुद बड़ा दिखायी पड़ेगा। लेकिन जितना अहंकार बड़ा होगा, उतनी भीतर आत्मा छोटी होती चली जाएगी। और जितना अहंकार बड़ा होगा, परमात्मा से मिलन का रास्ता उतना ही मुश्किल होता चला जाएगा। क्योंकि मेरे 'मै' के अतिरिक्त मुझे और कोई भी रोके हुए नहीं है। और जब तक मैने जिद की है कि मैं 'मैं' रहूंगा तब तक मैं विराट से मिल नहीं सकता हूं। वही तो बाधा बनेगी। इसीलिए हम दूसरे में दोष देखने के लिए आतुर होते हैं।

इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरों में दोष नहीं होते। इसका यह मतलब भी नहीं कि दूसरों में दोष हैं ही नहीं। दूसरों में दोष हों या न हो, यह सवाल गौण है महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हम दूसरों में दोष देखकर अपने को बड़ा करने की चेष्टा में संलग्न हैं? अगर हम इस चेष्टा में सलंग्न हैं तो हम बहुत आत्मघाती हैं। हम अपने हाथ से अपने को नुकसान पहुंचा रहे हैं, किसी और को नहीं। जिसके हम दोष देख रहे हैं उसे तो फायदा भी हो सकता है, हमारे दोष देखने से। लेकिन हमें फायदा नहीं हो सकता। हो सकता है, हमारे दोष देखने से वह दोष को बदलने में लग जाये। वह अपनी कमियों को बदलने में लगे जाए, हमारे दोष देखने से। लेकिन अगर हमारा अहंकार तृप्ति होता हो तो हम बहुत खतरनाक ढंग से अपने ही हाथ-पैर काटने में लगे हैं। हमें कोई हित न होगा।

लेकिन एक इससे उल्टी भ्रांति भी चलती है। एक भ्रांति तो यह है कि हम सबमें दोष ही देखेंगे। इससे एक उल्टी भ्रांति भी है कि अगर दोष होंगे भी तो हम आंख बंद कर लेंगे, हम दोष न देखेंगे। वह उल्टी भ्रांती भी खतरनाक हो सकती है; और वह भी अहंकार को बढ़ाने वाली हो सकती है। अगर मैंने यह तय कर लिया है कि मैं किसी के दोष देखूंगा ही नहीं तो मेरे भीतर एक नये तरह का अहंकार बढ़ना शुरु होगा कि मैं ऐसा आदमी हूं जो किसी के दोष कभी नहीं देखता। चोर सामने चोरी करेगा तो मैं आंखें बंद कर लूंगा और चार गुंडे एक स्त्री पर हमला करेंगे तो मैं पीठ फेरकर अपने रास्ते पर चला जाऊंगा। मैं किसी के दोष नहीं देखता हूं। और चूंकि मैं दोष नहीं देखता हूं इसलिए मैं एक बहुत महान आदमी हूं।

पहली भूल में अहंकार तृप्त होता है, दूसरी भूल में भी तृप्त हो सकता है। इसलिए असली सवाल दोष देखने और न देखने का नहीं है। सवाल है कि देखने से, न देखने से अहंकार को तो नहीं भर रहे हैं हम अपने? लेकिन जो आदमी अहंकार नहीं भर रहा है, वह सिर्फ देखता है। उसे दोष दिखायी पड़ सकते है, निर्दोषता भी दिखायी पड़ सकती है। वह वही देखता है जो है, उसे जो है के देखने से अपने अहंकार को न भरता है, न छोटा करता है, न बड़ा करता है।
-ओशो
पुस्तकः जीवन ही है प्रभु
प्रवचन नं. 4 से संकलित
पाप और पुण्य
भीतर का दीया जला हो, तो वह जो भी करे वह पुण्य होगा। हो सकता है ऊपर से दिखाई पड़े की यह तो पुण्य नहीं, यह कर्म तो पुण्य नहीं; लेकिन वह पुण्य ही होगा। असंभव है कि उससे पाप हो जाए। क्योंकि जिसका बोध जाग्रत है उससे पाप कैसे हो सकता है? उससे पाप नहीं हो सकता...
भीतर दीया जला हो चैतन्य का, तो जो कर्म होते हैं वे पुण्य हैं। भीतर दीया बुझा हो, तो जो कर्म होते हैं वे पाप हैं। समझ लेना आप! कोई कर्म न तो पाप होता है, न पुण्य होता है। पुण्य और पाप करने वाले पर निर्भर होते हैं। कोई कर्म पाप और पुण्य नहीं होता। आमतौर से हम यही मानते हैं की कर्म पुण्य और पाप होते हैं। यह काम बुरा है और वह काम अच्छा है।

यह बात नहीं है। जिस आदमी के भीतर का दीया बुझा है वह कोई अच्छा काम कर ही नहीं सकता। यह असंभव है। दिख सकता है कि अच्छा काम कर रहा है। जिनके भीतर दीए जले रहे हैं उनके कर्मों का अनुकरण कर सकता है। लेकिन अनुकरण में भी वासना उसकी विपरीत होगी। अगर वह मंदिर बनाएगा, तो वह परमात्मा का नहीं होगा, अपने पिता का होगा, उनका लिखवा देगा। अगर वह किसी को दान देगा, तो फिकर में होगा कि अखबारनवीस, जर्नलिस्ट आस-पास हैं या नहीं। वे खबर छापते हैं या नहीं छापते। वह दान प्रेम और करुणा नहीं होगी, वह भी अहंकार का प्रकाशन होगा। अगर वह किसी की सेवा करेगा, तो वह सेवा सेवा नहीं होगी। वह सेवा के गुणगान भी करेगा, करवाना चाहेगा। वह कहेगा, मैं सेवक हूं! वह चाहेगा कि लोग मानें कि मैंने सेवा की है। वह जो भी करेगा, उसके करने के पीछे चूंकि दिया जला हुआ नहीं है, इसलिए काम अच्छे दिखाई पड़ें भला, पाप ही होंगे। भीतर दीया जला न हो, तो जो भी हो सकता है वह पाप ही हो सकता है। पाप मेरे लिए चित्त की एक दशा है, कर्म का स्वरुप विभाजन नहीं।

और अगर भीतर का दीया जला हो, तो वह जो भी करे वह पुण्य होगा। हो सकता है ऊपर से दिखाई पड़े की यह तो पुण्य नहीं, यह कर्म तो पुण्य नहीं; लेकिन वह पुण्य ही होगा। असंभव है कि उससे पाप हो जाए। क्योंकि जिसका बोध जाग्रत है उससे पाप कैसे हो सकता है? उससे पाप नहीं हो सकता।

लेकिन हम कर्म के ताल पर चीजों को नापते-तौलते हैं। कल या परसों मैंने आपसे कहा, आचरण बहुत मूल्यवान नहीं है, अंतस मूल्यवान है। तो अंतस पाप की स्थिति में हो सकता है यदि अंधकार से भरा है; अंतस पुण्य की स्थिति में होता है अगर वह प्रकाश से भरा है। प्रकाशपूर्ण चित्त पुण्य की दशा में है; अंधकारपूर्ण चित्त पाप की दशा में है। ये कर्म के लक्षण नहीं हैं। ये कर्म के बिलकुल लक्षण नहीं हैं। कर्म का लक्षण, कर्म का लक्षण कुछ भी नहीं करता। क्योंकि व्यक्ति भीतर बिलकुल दुर्जन हो सकता है, आचरण बाहर सज्जन का कर सकता है-अनेक कारणों से।

हम इतने लोग यहां बैठे हैं, शायद सोचते होंगे की हम चोरी नहीं करते तो हम बड़ा पुण्य करते हैं। लेकिन अगर आज पता चल जाए कि हुकूमत नष्ट हो गई, चौरस्ते पर कोई पुलिस का आदमी नहीं है, अब कोई अदालत न रही, अब कोई सिपाही नहीं, अब कोई कानून नहीं। फिर पता चलेगा कितने लोग चोरी नहीं करते हैं। आप सोचते होंगे कि हम चोरी नहीं करते तो बड़ा पुण्य का काम कर रहे हैं।

चोरी न करना काफी नहीं है, चित्त में चोरी के न होने का सवाल है। आपको अगर सबको सुविधा और पूरा मौका मिल जाए, मुश्किल से कोई बचेगा जो चोरी न करे। तो यह जो अचोरी है, यह फिर पुण्य नहीं है। यह केवल भय और दहशत और डर, कमजोरी, और अनेक बातें हैं जिनकी वजह से आप चोरी नहीं कर रहे हैं। आपको मौका नहीं है, भयभीत हैं, कमजोर हैं, डरे हुए हैं; उस डर को, भय को छिपाने के लिए, अदालत से, नरक से घबड़ाए हुए हैं, उसको छिपाने के लिए आप कहते हैं, मैं तो चोरी नहीं करता, चोरी करना बहुत बुरी बात है। मैं तो चोरी करने का बुरा काम करता ही नहीं।

जो आदमी कर रहा है चोरी, उसमें आप में हो सकता है केवल सामर्थ्य का और साहस का फर्क हो। केवल सामर्थ्य और साहस का फर्क हो, वह ज्यादा साहसी हो। या हो सकता है विवेकहीन हो! इसलिए विवेकहीन में ज्यादा साहस दिखाई पड़ जाता है। क्योंकि उसे समझ में नहीं आता है कि मैं क्या कर रहा हूं, क्या परिणाम होगा! आप सब हिसाब-किताब सोचते हैं।

लेकिन अगर सारी चोरी की सुविधाएं हों, सारी चोरी की भीतर अनुकूल परिस्थिति हो, और फिर कोई आदमी चोरी न करे, तो बहुत अलग बात हो जाएगी, बहुत अलग बात हो जाएगी। अगर यह भी कोई कह दे कि चोरी करने वाले अब नरक नहीं जाएंगे बल्कि स्वर्ग जाएंगे; कोई धर्मशास्त्र यह भी कहने लगे कि अब चोरी करने वाले, अब कानून बदल गया परमात्मा का, अब वे उनको नरक नहीं भेजते, अब उनको स्वर्ग भेजते हैं; फिर भी कोई आदमी चोरी न करे। अगर यह पता चल जाए कि अब चोरी करने वालों को कष्ट नहीं दिया जाता बल्कि सम्मान मिलता है, और राष्ट्रपति जो हैं वह उनको पुरस्कार देते हैं और पदवियां देते हैं, और भगवान भी अब उनका सत्कार करने लगे हैं; फिर भी कोई चोरी न करे। अगर कोई यह कहे कि जो चोरी नहीं करेगा उसको नरक में डाला जायेगा और सड़ाया जायेगा; और फिर भी चोरी न कर सके। तब तो समझना कि उसके चित्त कि स्थिति अचोरी की हो गई है। नहीं तो उसकी चित्त की स्थिति अचोरी की नहीं है। यह सारी बात है।

अब जैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान का झगड़ा हुआ या हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। जब बंटवारा हुआ, तो जो पड़ोस में थे, भले लोग थे, मंदिर जाते थे, मस्जिद जाते थे, वे एक-दूसरे कि छाती में छुरा भोंकने लगे, क्योंकि मौका मिल गया। उसके पहले मौका नहीं था तो वे मस्जिद जाते थे; अब मौका मिल गया तो छुरा भोंकने लगे। मौका नहीं मिलता था तो मंदिर में प्रार्थना करते थे; मौका मिल गया तो मकान में आग लगाने लगे।

कल जब ये मंदिर जा रहे थे तब आप सोचते हैं ये दूसरे आदमी थे? यह छुरा भोंकने वाला आदमी कल भी मौजूद था। लेकिन परिस्थिति नहीं थी इसलिए प्रकट नहीं हो रहा था, छिपा हुआ था। आज परिस्थिति प्रकट होने की हो गई है, यह प्रकट हो गया। कल मालूम हो रहा था की मंदिर जाना पुण्य है; आज पता चल रहा है कि दस हजार हिंदुओ को काट सकता है, आग लगा सकता है या मुसलमानों को आग लगा सकता है। यह वही आदमी है।

मेरे गांव में वहां हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए, तो मैंने देखा कि वे ही लोग जिनको हम समझते हैं भले हैं, जो रोज सुबह गीता उठकर पढ़ते हैं, वे इकट्ठे करने लगे कि किस तरह मुसलमानों को काटा जाए। तो मैं मानता हूं, जब वे गीता को पढ़ते थे, यही के यही आदमी थे। गीता आगे पढ़ रहे थे, भीतर वही काटना-पीटना छिपा था, मौजूद था। परिस्थिति नहीं थी। परिस्थिति सामने आ गई, एक नारा खड़ा हो गया कि हिंदू-मुसलमान में दंगा हो गया। इतनी सी बात अखबार में छप गई और यह आदमी बदल गया! यह मकान जलाने कि सोचने लगा! यह वही का वही आदमी है, मौका इसे नहीं था। अब बहाना मिल गया; अब एक मौका मिला कि अपनी हिंसा दिखा सकता है एक बहाने का नाम लेकर। एक स्लोगन-कि मैं हिंदू हूं और हिंदू धर्म खतरे में है, मुसलमान को खतम करो! अब यह बहाना मिल गया, अब यह खतरा कर सकता है।

इनको कोई भी मिल जाए-गुजराती और मराठी में झगड़ा हो जाए, हिंदी बोलने वाले और गैर-हिंदी बोलने वालों में विरोध हो जाए-तो ये आग लगाने लगेंगे, हत्या करने लगेंगे। इनका सब धर्म, इनकी सब अहिंसा, इनकी सब नैतिकता एक तरफ धरी रह जाएगी। तो इनकी नैतिकता चल रही थी वह बिलकुल झूठी थी, उसका कोई मूल्य नहीं था। इनकी जो अहिंसा चल रही थी, बिलकुल थोथी थी, उसका कोई मूल्य नहीं है। इनके भीतर ये सब चीजें छिपी थीं, अवसर कि तलाश थी।

आप दुनिया को अवसर दे दें, यह जमीन इसी वक्त नरक हो सकती है इसी क्षण। आप नरक का पूरा इंतजाम किये बैठे हैं। लेकिन मंदिर भी जाते हैं, दान भी करते हैं, ग्रंथ भी पढ़ते हैं, सदगुरु के चरणों में प्रणाम भी करते हैं। ये बातें भी है, और आप अभी नरक बना दें इसी जगह को इसी क्षण, एक सेकेंड में यह नरक हो जाए। एक नारा उठे और यह अभी नरक हो जाए। अभी जिस आदमी के पास बैठ कर आप बड़े धार्मिक बने बैठे हैं उसी की गर्दन दबा सकते हैं इसी वक्त। तो मेरा मानना यह है कि आप जब नहीं दबा रहे हैं तब भी आप दबाने कि स्थिति में तो हैं; नहीं तो एकदम से कैसे स्थिति आ जाएगी?

पाप की स्थिति होती है, पाप का कर्म नहीं होता। वह स्टेट ऑफ माइंड है। और जब तक हम उसको कर्म समझेंगे, तब तक दुनिया में बहुत क्रांति नहीं हो सकती। क्योंकि कर्म का कोई पता नहीं चलता। कर्म तो मौके-मौके पर प्रकट होते हैं और अच्छे-अच्छे बहाने लेकर प्रकट हो जाते हैं। अच्छे-अच्छे बहाने ले लेते हैं और प्रकट हो जाते हैं। इसीलिए यह संभव हुआ है कि दुनिया में कोई भी शैतान आदमी, कोई भी हुकूमत, कोई भी पोलिटीशियन, कोई भी राजनीतिज्ञ किसी भी क्षण दुनिया को युद्ध में डाल सकता है, किसी भी क्षण! क्योंकि सारे लोग तैयार हैं पाप करने को, बिलकुल तैयार हैं। मौका नहीं है उनको। किसी भी क्षण, कोई भी बहाना-डेमोक्रेसी का, कम्युनिज्म का, भारत का, पाकिस्तान का, हिंदू का, मुसलमान का-कोई भी नारा, जरा सी आग पकड़ाने कि जरुरत है और आप दुनिया को एकदम पाप से भर सकते हैं। फिर लाखों को काट सकते हैं और मजा लेंगे।

ये वे ही लोग जो पानी छान कर पीते हैं, यह खबर सुन कर प्रसन्न होते हैं कि पाकिस्तान का फलां गांव बर्बाद कर दिया गया। या हिंदुस्तान का फलां गांव बर्बाद कर दिया गया; वही आदमी जो रोज नमाज पढ़ता है, वह प्रसन्न होता है कि अच्छा हुआ।

मैं यह समझ नहीं सकता कि यह आदमी जो पानी छान कर पीता था, अखबार में पढ़ता है, रात को खाना नहीं खाता था, अखबार में पढ़ता है कि इतने पाकिस्तानी मर गए, तो सोचता है बहुत अच्छा हुआ। यह आदमी अहिंसक है? इसका पानी छान कर पीना धोखा है, बेईमानी है। इसका रात को न खाना सब झूठी बकवास है। इसका कोई मतलब और मूल्य नहीं है। इसका स्टेट ऑफ माइंड तो पाप का है। यह कर्म-वर्म कुछ भी करे, इसकी चित्त कि दशा तो पापपूर्ण है।

इसलिए दुनिया को कभी किसी भी भूकंप में डाला जा सकता है, किसी भी उपद्रव में डाला जा सकता है। लोगों के काम तो बड़े अच्छे मालूम होते हैं, लेकिन चित्त कि दशा जरा ही, स्किनडीप, जरा सी चमड़ी उघाड़ो, भीतर पाप मौजूद है। और काम बड़े अच्छे-अच्छे कर रहे हैं।

टॉल्सटॉय ने लिखा है कि मैं एक दिन सुबह-सुबह चर्च में गया। अंधेरा था, सर्दी के दिन थे बर्फ पड़ती थी, कोई नहीं था चर्च में, मैं गया। एक और आदमी था, वह कन्फेशन कर रहा था भगवान के सामने। उसे पता नहीं की कोई दूसरा भी अंधेरे में मौजूद है, नहीं तो कन्फेशन करता ही क्यों? वह वहां कह रहा था कि हे परमपिता, मैं बड़ा बुरा आदमी हूं, मेरे मन में बड़े पाप उठते हैं, तू मुझे क्षमा कर! चोरी का भाव भी आता है, पर-स्त्री-गमन का भाव भी आता है, दूसरे के धन को हड़प लेने की वृति भी पैदा होती है, तू क्षमा कर! उसे पता नहीं था की यहां कोई और आदमी भी खड़ा है। वह चर्च से बाहर निकला, टॉल्सटॉय उसके पीछे हो लिया। जब बीच बाजार में पहुंचे, सुबह हो गई थी, लोग आ-जा रहे थे, उसने चिल्ला कर कहा कि ओ पापी, चोर, खड़ा रह!

वह आदमी बोला, अरे, कौन कहता है मुझसे पापी और चोर?

टॉल्सटॉय ने कहा कि मैं चर्च में मौजूद था, मैंने सुन लिया है।

उस आदमी ने कहा, अगर दुबारा मुंह से निकला तो अदालत में अपमान का मुकदमा चलाऊंगा। वह बड़ा प्रतिष्ठित आदमी था गांव का। वह मैंने भगवान के सामने कहा था, तुम्हारे सामने नहीं कहा था।

टॉल्सटॉय ने कहा, मैंने तो यह सोचा कि तूने मान लिया है कि तू पापी है, चोर है। लेकिन तू मानने को राजी नहीं। अदालत में मुकदमा चलाएगा?

यह स्थिति है हमारे चित्त की। भीतर तो वह छिपा है और बाहर हम अदालत में मुकदमा चलाएंगे अगर कोई हमसे चोर कह दे, हम शिकायत करेंगे कि यह क्या आपने हमसे कह दिया! तो हमारा कर्म हमारा ऊपर का आवरण मूल्य नहीं रखता। मूल्य तो अंतस रखता है। उस अंतस की क्रांति की बात है।

तो मैं मानता हूं, पाप-पुण्य कर्मो में नहीं होते, पाप-पुण्य होते हैं चित्त की दशाओं में। एक आदमी की चित्त की दशा पाप की हो, अंधकार की हो, तो वह कुछ भी करे, कुछ भी करे, कितना भी पानी छाने, कितनी ही बार छाने, उसकी हिंसा नहीं मिटेगी। और कितना ही रात को खाए, न खाए, कितना ही उपवास करे, न करे, कितनी ही पूजा करे, कितनी ही प्रार्थना करे-कुछ भी करे, लाख करे-अगर भीतर चित्त की दशा अंधकारपूर्ण है, उसका सब करना पापपूर्ण होगा। उसके भीतर पाप की स्थिति बनी रहेगी। वह जा नहीं सकती। वह किसी स्थिति में नहीं जा सकती।
-ओशो
पुस्तकः जीवन रहस्य
प्रवचन नं 4 से संकलित
संन्यास और गैरिक वस्त्र
गैरिक वस्त्र तुम्हें भीड़ से अलग करने का उपाय है, तुम्हें व्यक्तित्व देने की व्यवस्था है; ताकि तुम भीड़ से भयभीत होना छोड़ दो; ताकि तुम अपना स्वर उठा सको, अपने पैर उठा सको, पगडंडी को चुन सको...
उतरना हो तो थोड़ा पागल होना जरूरी है। ये पागल होने के रास्ते हैं, और कुछ भी नहीं। ये तुम्हारी होशियारी को तोड़ने के रास्ते हैं, और कुछ भी नहीं। ये तुम्हारी समझदारी को पोंछने के रास्ते हैं, और कुछ भी नहीं।

गैरिक वस्त्र पहना दिये, बना दिया पागल! अब जहां जाओगे, वहीं हंसाई होगी। जहां जाओगे, लोग वहीं चैन से न खड़ा रहने देंगे। सब आंखें तुम पर होंगी। हर कोई तुमसे पूछेगाः 'क्या हो गया?' हर आंख तुम्हें कहती मालूम पड़ेगी, 'कुछ गड़बड़ हो गया। तो तुम भी इस उपद्रव में पड़ गये? सम्मोहित हो गये?

गैरिक वस्त्रों का अपने-आप में कोई मूल्य नहीं है। कोई गैरिक वस्त्रों से तुम मो़क्ष को न पा जाओगे। गैरिक वस्त्रों का मूल्य इतना ही है कि तुमने घोषणा की कि तुम पागल होने को तैयार हो। तो फिर आगे और यात्रा हो सकती है। यहीं तुम डर गये तो आगे क्या यात्रा होगी?

आज तुम्हें गैरिक वस्त्र पहना दिये, कल एकतारा भी पकड़ा देंगे। उंगली हाथ में आ गयी तो पहुचा भी पकड़ लेंगे। यह तो पहचान के लिए है आदमी हिम्मतवर है या नहीं। हिम्मतवर है तो धीरे-धीरे और भी हिम्मत बढ़ा देंगे। आशा तो यही है कि कभी तुम सड़कों पर मीरा और चैतन्य की तरह नाच सको।

आदमी ने हिम्मत ही खो दी है। भीड़ के पीछे कब तक चलोगे?

ये गैरिक वस्त्र तुम्हें भीड़ से अलग करने का उपाय है, तुम्हें व्यक्तित्व देने की व्यवस्था है; ताकि तुम भीड़ से भयभीत होना छोड़ दो; ताकि तुम अपना स्वर उठा सको, अपने पैर उठा सको, पगडंडी को चुन सको।

राजमार्गों से कोई कभी परमात्मा तक न पहुंचा है, न पहुंचेगा; पगडंडियों से पहुंचता है। और हम धीरे-धीरे इतने आदी हो गये हैं भीड़ के पीछे चलने के कि जरा-सा भीड़ से अलग होने में डर लगता है।

जिन मित्रों ने पूछा है किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, बुद्धिमान हैं, सुशिक्षित हैं- फिर विश्वविद्यालय में गैरिक वस्त्र पहनकर जाएंगे, तो अड़चन मैं समझता हूं। वैसे ही अध्यापक मुसीबत में हैं; गैरिक वस्त्र की पूरी फजीहत हुई रखी है!

प्रश्न पूछा है तो जानता हूं कि मन में आकांक्षा भी जगी है, नहीं तो पूछते क्यों। अब सवाल है-हिम्मत से चुनेंगे कि फिर हिम्मत छोड़ देंगे? कठिन तो होगा। कठिन हो, यही तो पूरी व्यवस्था है।

पूछा है कि माला वस्त्रों के ऊपर ही पहननी क्यों जरूरी है। इच्छा पहनने की साफ है, मगर कपड़ों के भीतर पहनने की इच्छा है। नहीं, भीतर पहनने से न चलेगा; वह तो न पहनने के बराबर हो गया। वह बाहर पहनाने के लिए कारण है। कारण यही है कि तुम्हें किसी तरह भी भीड़ के भय से मुक्त करवाना है-किसी भी तरह। किसी भी भांति तुम्हारे जीवन से यह चिंता जाए कि दूसरे क्या कहते हैं, तो ही आगे कदम उठ सकते हैं। अगर परमात्मा का होना है तो समाज से थोड़ा दूर होना ही पड़ेगा। क्योंकि समाज तो बिल्कुल ही परमात्मा का नहीं है। समाज के ढांचे से थोड़ा मुक्त होना पड़ेगा।

न तो माला का कोई मूल्य है, न गैरिक वस्त्रों का कोई मूल्य है; अपने-आप में कोई मूल्य नहीं है-मूल्य किसी और कारण से है। अगर यह सारा मुल्क ही गैरिक वस्त्र पहनता हो तो मैं तुम्हें गैरिक वस्त्र न पहनाऊंगा; तो मैं कुछ और चुन लूंगा काले वस्त्र, नीले वस्त्र। अगर यह सारा मुल्क ही माला पहनता हो तो मैं तुम्हें माला न पहनाऊंगा; कुछ और उपाय चुन लेंगे।

बहुत उपाय लोगों ने चुने। बुद्ध ने सिर घोंट दिया भिक्षुओं का, उपाय है। अलग कर दिया। महावीर ने नग्न खड़ा कर दिया लोगों को, उपाय है।

थोड़ा सोचो, जिन लोगों ने हिम्मत की होगी महावीर के साथ जाने की और नग्न खड़े हुए होंगे, जरा उनके साहस की खबर करो। जरा विचारो। उस साहस में ही सत्य ने उनके द्वार पर आकर दस्तक दे दी होगी।

बुद्ध ने राजपुत्रों को, सम्पत्तिशालियों को भिखारी बना दिया द्वार-द्वार का, भिक्षापात्र हाथ में दे दिये। जिनके पास कोई कमी न थी, उन्हें भिखारी बनाने का क्या प्रयोजन रहा होगा? अगर भिखारी होने से परमात्मा मिलता है तो भिखमंगों को कभी का मिल गया होता। नहीं, भिखारी होने का सवाल न था-उन्हें उतारकर लाना था वहां, जहां वे निपट पागल सिद्ध हो जाएं। उन्हें तर्क की दुनिया के बाहर खींच लाना था। उन्हें हिसाब-किताब की दुनिया के बाहर खींच लाना था। जो साहसी थे, उन्होंने चुनौती स्वीकार ली। जो कायर थे, उन्होंने अपने भीतर तर्क खींच लिये। उन्होंने कहा, क्या होगा सिर घुटाने से? क्या होगा नग्न होने से? क्या होगा गैरिक वस्त्र पहनने से?'

यह असली सवाल नहीं है। असली सवाल यह है, 'तुम में हिम्मत है?' पूछो यह बात कि क्या होगा हिम्मत से। हिम्मत से सब कुछ होता है। साहस के अतिरिक्त और कोई उपाय आदमी के पास नहीं है। दुस्साहस चाहिए!

लोग हंसेंगे। लोग मखौल उड़ांएगे। और तुम निश्चिन्त अपने मार्ग पर चलते जाना। तुम उनकी हंसी की फिक्र न करना। तुम उनकी हंसी से डांवाडोल न होना। तुम उनकी हंसी से व्यथित मत होना। और तुम पाओगे, उनकी हंसी भी सहारा हो गयी; और उनकी हंसी ने भी तुम्हारे ध्यान को व्यवस्थित किया; और उनकी हंसी ने भी तुम्हारे भीतर से क्रोध को विसर्जित किया; और उनकी हंसी ने भी तुम्हारे जीवन में करूणा लायी।
....समाज के दायरे से मुक्त करने की व्यवस्था है। जिसको मुक्त होना हो और जिसे थोड़ी हिम्मत हो अपने भीतर, भरोसा हो थोड़ा अपने पर; अगर तुम बिलकुल ही बिक नहीं गये हो समाज के हाथों; और अगर तुमने अपनी सारी आत्मा गिरवी नहीं रख दी है; तो चुनौती स्वीकार करने जैसी है।

सत्य कमजोरों के लिए नहीं है, साहसियों के लिए है।
-ओशो
पुस्तकः भक्ति-सूत्र
प्रवचन नं. 8 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है।
जोरबा दि बुद्धाः एक नया मनुष्य
नया मनुष्य, मेरा विद्रोही जोरबा दि बुद्धा पूरे संसार को अपना घर होने का दावा करता हैं। इसमें जो कुछ भी है वह हमारा है और हमें हर संभव तरीके से इसका उपयोग करना है-बिना किसी अपराध-भाव के, बिना किसी संघर्ष के और बिना किसी चुनाव के...
मेरा विद्रोही नया मनुष्य ही 'जोरबा-बुद्ध है। मनुष्यता अभी तक यह विश्वास करते हुए जीती आई है कि या तो आत्मा ही एकमात्र वास्तविकता है और संसार और पदार्थ एक भ्रम हैं अथवा पदार्थ ही वास्तविक है और आत्मा मात्र एक भ्रम है।

तुम अतीत की मनुष्यता को, अध्यात्मवादियों और पदार्थवादियों में विभाजित कर सकते हो, लेकिन किसी ने भी मनुष्य की वास्तविकता की ओर देखने की फिक्र ही नहीं की। वे दोनो एक साथ हैं। वे न तो केवल आध्यात्मिक हैं-वे केवल मात्र चेतना ही नहीं है और न केवल पदार्थ हैं। वह चेतना और पदार्थ के मध्य एक बहुत बड़ी लयबद्धता है अथवा शायद पदार्थ और चेतना दो अलग चीजें न होकर एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। पदार्थ चेतना के बाहर का भाग है और पदार्थ का आंतरिक भाग है चेतना, लेकिन अतीत में ऐसा एक भी दार्शनिक, ऋषि अथवा विद्रोही रहस्यदर्शी नहीं हुआ, जिसने इस एकता की घोषणा की होः वे सभी मनुष्य को विभाजित करने के पक्ष में थे, जो एक भाग को सच्चा और दूसरे भाग को झूठा कहते थे। इसने पूरी पृथ्वी में एक ऐसा वातावरण उत्पन्न कर दिया, जहां मनुष्य के विचारों, भावों और कार्यो में कोई तारतम्य नहीं रह गया।

तुम केवल एक शरीर बनकर ही नहीं जी सकते। जीसस के कहने का भी यही अर्थ है, जब वह कहते हैं-'मनुष्य अकेला रोटी से ही नहीं जी सकता।' तुम अकेली चेतना बनकर भी नहीं जी सकते और न ही तुम बिना बेटी रोटी के जीवित रह सकते हो।

तुम्हारे होने के दो आयाम हैं और दोनों आयामों को, विकास का समान अवसर देकर दोनों को परिपूर्ण बनाना है, लेकिन अतीत एक आयाम के पक्ष में और दूसरे के विरोध में अथवा दूसरे के पक्ष में और पहले के विरोध में रहा है।

मनुष्य को उसकी समग्रता में स्वीकार नहीं किया गया है और इसने दुख और वेदना के घने अंधेरे की, हजारों वर्षों से, एक ऐसी रात उत्पन्न कर दी जिसका लगता है जैसे कोई अंत है ही नहीं। यदि तुम शरीर की बात नहीं सुनते हो तो तुम दुख भोगते हो क्योंकि तुम्हें भूख लगती है, प्यास लगती है और तुम्हें गरीबी के अभाव झेलने होते हैं। यदि तुम केवल चेतना की बात सुनते हो तो तुम्हारे विकास का संतुलन गड़बड़ा जाएगाः तुम्हारी चेतना का ही विकास होगा, लेकिन शरीर सिकुड़ जाएगा और संतुलन खो जाएगा और संतुलन में ही तुम्हारा स्वास्थ्य है, संतुलन में ही तुम्हारी समग्रता है, संतुलन में ही तुम्हारा आनंद, गीत और नृत्य है।

पश्चिम ने शरीर की बात सुनने का चुनाव किया और जहां तक चेतना की वास्तविकता संबंध है, वह पूरी तरह बहरा बन गया। इसका अंतिम परिणाम है-विज्ञान और तकनीकि ज्ञान की अभूतपूर्व प्रगति और तुच्छ सांसारिक वस्तुओं से समृद्धि एक स्वतंत्र और उन्मुक्त समाज। इस प्रचुर समृद्धि के बीच, बिना आत्मा का गरीब मनुष्य पूरी तरह खो गया है-कोई जानता ही नहीं कि वह है कौन, वह है भी या नहीं है और कोई नहीं जानता कि वह है क्यों और किसी दुर्घटनावश कभी यह ख्याल आ जाता है कि ऐसी दुर्लभ किस्म का कोई मनुष्य होता भी है।

जब तक चेतना का विकास भौतिक जगत की समृद्धि के साथ-साथ नहीं होता, शरीर और पदार्थ बहुत अधिक भारयुक्त हो जाते हैं और आत्मा बहुत कमजोर बन जाती है। अपने ही अविष्कारों और खोजों के कारण तुम्हारे ऊपर बहुत अधिक भार है। वस्तुतः तुम्हारे लिए एक सुंदर जीवन निर्मित करने के स्थान पर वे एक ऐसा जीवन निर्मित करते हैं जिसे पश्चिम के सभी बुद्धिजीवियों द्वारा जीवन के अयोग्य अनुभव किया गया है।

पूरब ने चेतना का चुनाव किया है और पदार्थ की निंदा की है। उनके अनुसार प्रत्येक भौतिक वस्तु जिसमें शरीर भी सम्मिलित है, एक माया है। एक भ्रम है, वह मरूस्थल में एक मृगतृष्णा के समान दिखाई देती है और जिसकी कोई वास्तविकता नहीं है। पूरब ने गौतम बुद्ध, महावीर, पंतजलि, कबीर, फरीद और रैदास जैसे लोग उत्पन्न किए और पूरी तरह होश से भरे हुए इन महान चेतना-पुरुषों की लम्बी श्रृंखला है। पर इसी ने उत्पन्न किया उन लाखों करोड़ों गरीबों को, जिनके पास न खाने को पर्याप्त अन्न, न पर्याप्त वस्त्र और न सिर छिपाने को छत है और जो कुत्तों की तरह भूखों मर रहे हैं।

बड़ी अजीब स्थिति है-पश्चिम में वे हर छः महीनों बाद अरबों डालर कीमत के दुग्ध उत्पाद और अन्य भोजन सामग्री आवश्यकता से अधिक होने के कारण समुद्र में डुबो देते हैं। वे यह नहीं चाहते कि उनके गोदामों पर अतिरिक्त भार हो और वे अपने आर्थिक ढांचे को सुदृढ़ रखने के लिए उनकी कीमतें भी नहीं घटाना चाहते। एक ओर इथोपिया में एक हजार मनुष्य प्रतिदिन की दर से भूखों मर रहे हैं तो दूसरी ओर इसी वक्त यूरोप का साझा बाजार करोड़ों डालर का भोजन नष्ट कर रहा है। यह राशि भी उस भोजन सामग्री का मूल्य नहीं है, यह वह लागत है जो भोजन सामग्री को समुद्र तक ले जाने और उसे डुबाने में खर्च होती है। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है?

पश्चिम का सबसे अधिक धनी व्यक्ति आत्मा की खोज कर रहा है और अपने को खाली पा रहा है क्योंकि उसके पास केवल वासना है जिसमें प्रेम की कहीं कोई सुवास नहीं और उसके पास रविवारीय स्कूल में सीखे गए वे शब्द हैं जिन्हें वह तोते की तरह दोहराता है पर उस प्रार्थना में हृदय की पुकार और श्रद्धा नहीं। उसके पास कोई धार्मिकता नहीं, मनुष्य जाति की भलाई के लिए कोई भावना नहीं; पक्षियों, वृक्षों और पशुओं के प्रति, समस्त जीवन के प्रति कोई श्रद्धा नहीं और तभी विनाश इतना अधिक सरल है।

यदि मनुष्यों को पदार्थ मात्र ही न माना गया होता तो हिरोशिमा और नागासाकी में यह विनाश हुआ ही न होता। यदि यह ख्याल होता कि प्रत्येक मनुष्य में परमात्मा ही छिपा हुआ है तो इतने अधिक आणविक अस्त्र-शस्त्रों का ढेर इकट्ठा ही न किया गया होता और मनुष्य में छिपी परमात्मा की आभा को नष्ट न करके, उसके शरीर को परमात्मा का मंदिर मानते हुए उसे प्रकाश में लाया जाता, लेकिन यदि मनुष्य केवल एक ही पदार्थ या वस्तु है, केवल भौतिक या रसायन शास्त्र ही है और यदि वह खाल से मढ़ा एक हड्डियों का ढांचा मात्र है, तब मृत्यु के साथ प्रत्येक वस्तु मर जाती है और कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसी वजह से यह सम्भव हो पाता है कि बिना किसी हिचक के एडोल्फ हिटलर साठ लाख व्यक्तियों की हत्या कर दे। यदि सभी व्यक्ति केवल पदार्थ ही हैं तो इस बारे में दोबारा सोचने का प्रश्न ही कहां उठता है?

पश्चिम ने अपनी आत्मा खो दी है, अपने आंतरिक स्वभाव को खो दिया है। अर्थहीनता, ऊब और वेदना से घिरे हुए वह स्वयं को ही नहीं खोज पा रहा है। विज्ञान की सभी सफलताएं अनुपयोगी सिद्ध हो रही हैं, क्योंकि घर प्रत्येक वस्तु से भरा हुआ है, लेकिन घर का मालिक ही खोया हुआ है।

यहां पूरब में मालिक जो जीवित है, लेकिन घर पूरी तरह खाली है। भूखे पेटों और बीमार शरीरों के साथ जहां तुम्हारें चारों ओर मृत्यु घिरी हो, आनंद-उत्सव मनाते हुए ध्यान करना ही असम्भव है। अनावश्यक रूप से इसीलिए हम लोगों ने इतना सब कुछ खो दिया है।

हमारे सभी संत, सभी दार्शनिक, अध्यात्मवादी और पदार्थवादी दोनों ही मनुष्य के विरुद्ध किए गए इस अपराध के प्रति उत्तरदायी हैं।

जोरबा-बुद्ध होना ही इसका एकमात्र उत्तर है। यह पदार्थ और आत्मा का संश्लेषण है। यह इस बात की घोषणा है कि अब पदार्थ और चेतना के बीच कोई संघर्ष ही नहीं है और हम दोनों तरह से समृद्ध बन सकते हैं। हमारे पास प्रत्येक वह वस्तु हो सकती है जो संसार हमें उपलब्ध करा सकता है, विज्ञान और तकनीकि ज्ञान से जिसे हम उत्पन्न कर सकते हैं और इसके ही साथ-साथ हमारे पास वह भी प्रत्येक चीज हो सकती है, जिसे कोई एक बुद्ध, कोई नानक और कोई कबीर अपने अंदर अस्तित्व में अनुभव करता है, जिसके अंदर परमानंद की खिलावट होती है, भगवत्ता की सुवास चारों ओर फैल जाती है और सर्वोच्च स्वतंत्रता से उड़ान भरने के लिए जिसे पंख मिलते हैं।

जोरबा-बुद्ध होना ही नया मनुष्य होना है और यही होता है-विद्रोही। उसका विद्रोह नष्ट करता है मनुष्य की वह मानसिकता जिसमें उसके विचारों, भावों और कार्यो में तारतम्यता नहीं होती, वह नष्ट करता है उसके अंदर का विभाजन और नष्ट करता है वह आध्यात्मिकता, जो पदार्थवाद के विरुद्ध है और इसके ही साथ उस भौतिकता को भी नष्ट करता है जो आध्यात्मिकता के विरुद्ध है।

उसका घोषणा पत्र है कि शरीर और आत्मा दोनों साथ-साथ हैं और पूरा अस्तित्व आध्यात्मिकता से आपूरित है, यहां तक कि पर्वत भी जीवन्त हैं और वृक्ष भी संवेदनशील हैं और पूरे अस्तित्व में पदार्थ और चेतना दोनों एक साथ हैं अथवा केवल एक उर्जा ही है, जो दो रूपों में अभिव्यक्त हो रही है। जब उर्जा शुद्ध होती है वह अपने आपको चेतना के रूप में अभिव्यक्त करती है और जब वह अशुद्ध कच्चे रूप में सघन हो जाती है वह पदार्थ के रूप में दिखाई देती है, लेकिन पूरा अस्तित्व और कुछ भी नहीं, वरन बस एक उर्जा-क्षेत्र है।

यह कोई तत्वज्ञान न होकर मेरा अपना अनुभव है और अब भौतिकशास्त्र और उसकी खोजों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि अस्तित्व केवल एक उर्जा है।

हम मनुष्य को दोनों संसारों में साथ-साथ रहने की अनुमति दे सकते हैं। उसे दूसरा संसार पाने के लिए इस संसार को छोड़ने की जरूरत नहीं है और न उसे इस संसार का आनंद उठाने के लिए दूसरे संसार से इंकार करना है। वास्तव में जब तुम दोनों संसारों को एक साथ पाने में समर्थ हो तो फिर केवल एक संसार के साथ अनावश्यक रूप से गरीब बनकर क्यों रहा जाए?

जोरबा-बुद्ध होना ही समृद्धतम संभावना है। वह सर्वाधिक अपने स्वभाव के अनुसार जिएगा और वह इस पृथ्वी के गीत भी गाएगा। न तो वह पृथ्वी को धोखा देगा और न का आकाश के साथ दगा करेगा। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी सुंदर और आनंददायक है, जैसे विविध रंगों के सुवासित फूल, वह उन सभी पर अपने अधिकार की घोषणा करेगा और साथ-ही-साथ आकाश में चमकते सितारे भी उसके ही होंगे। वह दावा करेगा कि यह पूरा अस्तित्व ही अपना घर ही है।

अतीत का मनुष्य बहुत निर्धन था, क्योंकि उसने अस्तित्व को विभाजित कर दिया था। नया मनुष्य, मेरा विद्रोही जोरबा दि बुद्धा पूरे संसार को अपना घर होने का दावा करता हैं। इसमें जो कुछ भी है वह हमारा है और हमें हर संभव तरीके से इसका उपयोग करना है-बिना किसी अपराध-भाव के, बिना किसी संघर्ष के और बिना किसी चुनाव के। बिना किसी चुनाव के जितनी तुम्हारी शक्ति और सामर्थ्य हो, सभी पदार्थों का उपयोग करो और जितनी तुम्हारी शक्ति और योग्यता हो, उस सभी का जो चेतना में हैं, आनंद लो।

-एक जोरबा बनो लेकिन वहां रुको मत।

-बुद्ध बनने की ओर गतिशील होते रहो।

-जोरबा आधा है और बुद्ध भी आधे है।
-ओशो
पुस्तकः एक नई मनुष्यता का जन्म
प्रवचन नं. 8 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है
 

रहस्यदर्शियों की जीवन कथा
 
 
"जब किसी बुद्ध को उत्पन्न होना होता है, तो मां प्रभावित रहती है किन्हीं विशेष स्वप्नों द्वारा। क्योंकि हजारों बार यही स्वप्न फिर-फिर दोहराएं जाते हैं। इसका अर्थ होता है कि मां के भीतर की बुद्ध-चेतना एक निश्चित घटना निर्मित करती है उसके मन में और वह स्वप्न देखने लगती है एक विशेष आयाम के। उदाहरण के लिए बौद्ध कहते हैं कि जब कोई बुद्ध मां के भीतर होता है, तो मां स्वप्न देखती है सफेद हाथी का। यह एक प्रतीक है, किसी बहुत दुर्लभ चीज का प्रतीक- क्योंकि सफेद हाथी भारत की दुर्लभतम चीजों में से एक चीज है, करीब-करीब असंभव है उसे ढूढ़ निकालना। एक दुर्लभ प्राणी होता है गर्भ में और सफेद हाथी का प्रतीक मात्र एक संकेत है। और स्वप्नों की एक श्रृखंला पीछे-पीछे चली आती है।" -ओशो
दादू दयाल
कबीर की शिष्य परंपरा मे पांचवे राजस्थान के संत दादू संवत 1601 में अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर लोदीराम नाम के ब्राह्मण को पानी में बहते मिले थे। 11 की उम्र में श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हो गये। 13 साल में जब वे घर से भागे तो माता-पिता पकड़ कर वपास ले आये। लेकिन सात वर्ष बाद वे फिर भाग खड़े हुए और सागर पहुंच कर धुनिया का काम करने लगे।

वहीं 12 साल तक अध्ययन में करते रहे। उनके इस काम से कई ब्राह्मण खफा रहने लगे। एक बार जब दादू अपने घर में ध्यान लीन थे तो कुछ पंडितो ने ईर्ष्यावश उनके घर के द्वारों को ईटों से बंद करवा दिया था। जिसे बाद में उनके पड़ोसियों ने खोला। दादू ने कहा, अच्छा हुआ कि कृष्ण की उपासना करने का इतना शांत माहौल मिला। दयालु स्वभाव के होने के कारण दादू से संत दादूदयाल हो गये। मतलब दयालु संत। गुरु-कृपा से ज्ञान प्राप्त होने से इनके कई सैकडों शिष्य हो गए। जिनमें गरीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना मुख्य हैं। दादू हिन्दी, गुजराती, राजस्थानी आदि कई भाषाओं के ज्ञाता थे। इन्होंने शबद और साखी लिखीं। इनकी रचना प्रेमभावपूर्ण है। जात-पात के निराकरण, हिन्दू-मुसलमानों की एकता आदि विषयों पर इनके पद तर्क-प्रेरित न होकर हृदय-प्रेरित हैं।

प्रसिद्धि होने पर एक बार उन्हें अकबर बुलवाया और पूछा कि अल्लाह कि जाति क्या है ? इस पर दादू ने एक दोहा सुनाया-

इश्क अल्लाह की जाती है इश्क अल्लाह का अंग

इश्क अल्लाह मौजूद है, इश्क अल्लाह का रंग ।

कहा जाता है कि साधना के क्रम मे ही नाराना नगर कि भाराना पहाड़ी से वे गायब हो गए। आज भी उस पहाड़ी पर दादू के कपडे-किताबें आदि दादुपंथियो के पास हैं और उनकी एक समाधि भी है। दादू कि रचनाओं मे कबीर कि रचनाओं के कई अंश शामिल हैं।

दादू के बारें में सद्गुरु ओशो कहते हैं: मैं उसी को धार्मिक कहता हूं, जो न तो आस्तिक है, न नास्तिक है; खोजी है, यात्री है, जो कहता है, जीवन दांव पर लगा देंगे, लेकिन खोज कर रहेंगे। उसके जीवन में अंधेरे की प्रतीत हुई है। अब वह प्रकाश चाहता है। उसने प्यास को जाना है और जीवन के मरुस्थल को जाना है। वह मरूद्यान की खोज में है। वह किसी सरोवर की तलाश में है। और वह तलाश बौद्धिक नहीं है, उसका रोआं-रोआं प्यास से प्यासा है।

दादू उसी की बात कर रहे हैं। वे कहते हैं:

मन चित्त चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।

ऐसी बौद्धिक बातचीत से परमात्मा कुछ मिलेगा नहीं कि तुम बैठ कर गीता पढ़ लो, कि दर्शनशास्त्र का विचार कर लो; नहीं इससे कुछ न होगा।

मन चित चातक ज्यूं रटै, जैसे चातक चिल्लाता है रात भर-पिव पिव लागी प्यास! पियू पियू कहे चला जाता है। साधारण जल से राजी नहीं होता, स्वाति की बूंद की प्रतीक्षा करता है। वर्ष बिता देता है। दिन आते हैं, जाते हैं, चातक की रटन बढती चली जाती है।

चातक नाम का पक्षी केवल स्वाति नक्षत्र के पानी को ही पीता है। बाकी साल भर रोता रहता है। साधारण जल उसे तृप्त नहीं करता-स्वाति का परम जल चाहिये। संत साधारण जल से राजी नहीं-परमात्मा के जल से ही राजी है। साधारण प्रेम से उसे तृप्त नहीं कर पाता। जब तक परमात्मा की ही वर्षा उस पर न हो जाये, जब तक परम प्रेम न आ जाए तब तक वह प्यासा ही रहेगा।

मन चित चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।

बस उस प्यारे की ही प्यास लगी है। वही बुझा सकेगा।

दादू के शब्द बड़े महत्वपूर्ण हैं, वे कहते हैं, मन चित। मन के लिए भारत में बहुत शब्द हैं, ऐसा दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। अंग्रेजी में एक ही शब्द है-माइंड, लेकिन भारत में बहुत शब्द हैं। इसमें दो शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं दादू: मन, चित, चातक।

साधारण मन तो तुम्हारे पास है, चित तुम्हारे पास नहीं है। जब तक मन अँधेरे से राजी है तब तक वह चित नहीं है। जब मन चैतन्य की प्यास से भरता है और चैतन्य के आरोहण पर निकलता है; और जब कहता है चैतन्य होना है और चेतना है, जागना है, जागरण की अभीप्सा जब मन में पैदा होती है तब मन चित हो जाता है। तब मन साधारण मन न रहा। तब एक नई ही घटना घट गई। वह चैतन्य होने लगा।

मन साधारणतः अचित है, वह बेहोश है। तुम्हारा मन तो बिलकुल बेहोश है। तुम्हें पता नहीं तुम्हारा मन तुमसे क्या करवाता है। तुम करते रहते हो। जैसे कि कोई शराब के नशे में कर रहा है। किसी ने गाली दी, तुम्हें क्रोध आ गया। तुम कहते जरुर हो कि मैंने क्रोध किया, अब मैं क्रोध न करूंगा; लेकिन तुम गलत कहते हो। तुमने क्रोध किया नहीं। मन ने क्रोध करवा लिया। तुम मालिक नहीं हो। इसलिए तुम यह मत कहो कि मैंने क्रोध किया। अगर तुम करने ही वाले होते तब तो तुम्हारे बस में होता करते, या न करते। तुम मालिक नहीं हो।
-ओशो
पुस्तकः पिव पिव लागी प्यास से संकलित
संत सुन्दरदास
संत सुन्दरदासजी एक कवि ही नहीं बल्कि एक महान संत, धार्मिक एवं समाज सुधारक थे। उनका जन्म जयपुर राज्य की पुरानी राजधानी देवनगरी दौसा में भूसरगोत्र के खंडेलवाल वैश्य कुल में चैत्र शुक्ल नवमी संवत 1653 में हुआ। उनके पिता का नाम साहचोखा उमर नाम परमानंद तथा माता का नाम सती था। सुन्दरदासजी संत दादू के शिष्य थे। उन्होंने छोटी सी आयु में ही अपने गुरु से दीक्षा और आध्यात्मिक उपदेश प्राप्त कर लिया। संवत 1664 में जगजीवन जी दादू शिष्य रज्जबजी आदि के साथ काशी चले गए। काशी में रहकर उन्होंने संस्कृत, हिंदी व्याकरण, कोष शास्त्र, पुराण, वेदान्त का गहन अध्ययन किया।

संवत 1682 से जयपुर राज्य के शेखावटी प्रान्तवर्ती फतेहपुर में आये और वहां निवास किया। सुन्दरदास वहां योगाभ्यास कथा-कीर्तन तथा ध्यान आदि करते रहे। संत सुंदरदासजी का साहित्य सृजनकाल संवत 1664 से लेकर मृत्यु पर्यंत चलता रहा। सुंदरदासजी ने 42 मौलिक ग्रन्थ लिखे हैं, जो इनकी प्रखर प्रतिभा को उजागर करते हैं। ग्रंथों की भाषा सरल, सुबोध, स्पष्ट, सरस है।

ओशो कहते हैं: सुंदरदास थोड़े-से कलाकारों में एक है जिन्होंने इस ब्रह्म को जाना। फिर ब्रह्म को जान लेना एक बात है, ब्रह्म को जनाना और बात है। सभी जानने वाले जना नहीं पाते। करोड़ों में कोई एक-आध जानता है और सैकड़ों जाननेवालों में कोई एक जना पाता है। सुंदरदास उन थोड़े-से ज्ञानियों में से एक है, जिन्होंने निःशब्द को शब्द में उतारा; जिन्होंने अपरिभाष्य की परिभाषा की; जिन्होंने अगोचर को गोचर बनाया, अरूप को रूप दिया। सुंदरदास थोड़े-से सद्गुरूओं में से एक हैं। उनके एक-एक शब्द को साधारण शब्द मत समझना। उनके एक-एक शब्द में अंगारे छिपे है। और जरा-सी चिंगारी तुम्हारे जीवन में पड़ जाये तो तुम भी भभक उठ सकते हो परमात्मा से। तो तुम्हारे भीतर भी विराट का आविर्भाव हो सकता है। पड़ा तो है ही विराट, कोई जगाने वाली चिंगारी चाहिए।

चकमक पत्थरों में आग दबी होती है, फिर दो पत्थरों को टकरा देते हैं, आग प्रगट हो जाती है। ऐसी ही टकराहट गुरु और शिष्य के बीच होती हे। उसी टकराहट में ज्योति का जन्म होता है। और जिसकी ज्योति जली है वहीं उसको ज्योति दे सकता है, जिसकी ज्योति अभी जली नहीं है। जले दीये के पास हम बुझते दीये को लाते है। बुझे दीये की सामर्थ्य भी दीया बनने की है, लेकिन लपट चाहिए। जले दीये से लपट मिल जाती है। जले दीये का कुछ भी खोता नहीं है; बुझे दीये को सब मिल जाता है, सर्वस्व मिल जाता है।

यही राज है गुरु और शिष्य के बीच। गुरु का कुछ खोता नहीं है और शिष्य को सर्वस्व मिल जाता है। गुरु के राज्य में जरा भी कमी नहीं होती। सच पूछो तो, राज्य और बढ़ जाता है। रोशनी और बढ़ जाती है। जितने शिष्यों के दिए जगमगाने लगते हैं उतनी गुरु की रोशनी बढ़ने लगती है।

यहां जीवन के साधारण अर्थशास्त्र के नियम काम नहीं करते। साधारण अर्थशास्त्र कहता हैः जो तुम्हारे पास है, अगर दोगे तो कम हो जायेगा। रोकना, बचाना। साधारण अर्थशास्त्र कंजूसी सिखाता है, कृपणता सिखाता है। अध्यात्म के जगत में जिसने बचाया उसका नष्ट हुआ; जिसने लुटाया उसका बढ़ा। वहां दान बढ़ाने का उपाय है। वहां देना और बांटना-विस्तार है। वहां रोकना, संग्रहीत कर लेना, कृपण हो जाना-मृत्यु है।

इसलिए जिनके जीवन में रोशनी जन्मती है, वे बांटते हैं, लुटाते है। कबीर ने कहा हैः दोनों हाथ उलीचिए। लुटाओ! अनंत स्त्रोत पर आ गये हो, लुटाने से कुछ चुकेगा नहीं। और नयी धाराएं और नये झरने फूटते आएंगे। ऐसे एक ही ज्योति जल जाये तो अनेक की ज्योति जलती है। सुंदरदास के सत्संग में बहुमतों के दीए जले। ज्योति से ज्योति जले!

इन अपूर्व वचनों को ऐसे ही मत सुन लेना जैसे और बातें सुन लेते हो। और बातों की तरह सुन लिया तो सुना भी-और सुना भी नहीं। इन्हें तो गुनना! इन्हें सिर्फ कानों से मत सुनना! कानों के पीछे अपने ह्रदय को जोड़ देना, तो ही सुन पाओगे। सुनो तो जागना बहुत दूर नहीं है।

अनलिखे अक्षर बहुत
दीखे
बोल अनबोले बहुत
सीखे
भरे घट पाए कई
रीते
पनप भी पाए न हम
बीते!
अधिक लोग ऐसे ही जीते हैं।
पनप भी पाए न हम
बीते!
-ओशो
ज्योति से ज्योति जले
प्रवचन-9 से संकलित
अमीर खुसरो
खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम कवि अमीर खुसरो एक सूफीयाना कवि थे और ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के मुरीद थे। इनका जन्म सन् 1253 में हुआ था। इनके जन्म से पूर्व इनके पिता तुर्क में लाचीन कबीले के सरदार थे। मुगलों के जुल्म से घबरा कर इनके पिता अमीर सैफुद्दीन मुहम्मद हिन्दुस्तान आ गये थे और उत्तरप्रदेश के ऐटा जिले के पटियाली नामक गांव में जा बसे। इत्तफाकन इनका सम्पर्क सुल्तान शमसुद्दीन अल्तमश के दरबार से हुआ, उनके साहस और सूझ-बूझ से ये सरदार बन गए और वहीं एक नवाब की बेटी से शादी हो गई और तीन बेटे पैदा हुए उनमें बीच वाले अबुल हसन ही अमीर खुसरो थे। इनके पिता खुद तो खास पढे न थे पर उन्होंने इनमें ऐसा कुछ देखा कि इनके पढने का उम्दा इंतजाम किया। एक दिन वे इन्हें ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के पास ले गए जो कि उन दिनों के जाने माने सूफी संत थे।

मृत्यु- अमीर खुसरो किसी काम से दिल्ली से बाहर कहीं गए हुए थे वहीं उन्हें अपने ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के निधन का समाचार मिला। समाचार क्या था खुसरो की दुनिया लुटने की खबर थी। वे सन्नीपात की अवस्था में दिल्ली पहुंचे, धूल-धूसरित खानकाह के द्वार पर खडे हो गए और साहस न कर सके अपने पीर की मृत देह को देखने का। आखिरकार जब उन्होंने शाम के ढलते समय पर उनकी मृत देह देखी तो उनके पैरों पर सर पटक-पटक कर मूर्च्छित हो गए। और उसी बेसुध हाल में उनके होंठों से निकला,

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।

चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस।।

अपने प्रिय के वियोग में खुसरो ने संसार के मोहजाल काट फेंके। धन-सम्पत्ति दान कर, काले वस्त्र धारण कर अपने पीर की समाधि पर जा बैठे-कभी न उठने का दृढ निश्चय करके। और वहीं बैठ कर प्राण विसर्जन करने लगे। कुछ दिन बाद ही पूरी तरह विसर्जित होकर खुसरो के प्राण अपने प्रिय से जा मिले। पीर की वसीयत के अनुसार अमीर खुसरो की समाधि भी अपने प्रिय की समाधि के पास ही बना दी गई।

आज तक दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की समाधि के पास अमीर खुसरो की समाधि मौजूद है। हर बरस यहां उर्स मनाया जाता है। हर उर्स का आरंभ खुसरो के इसी अंतिम दोहे से किया जाता है - गोरी सोवे सेज पर।

ओशो कहते हैं: अमीर खुसरो एक बहुत अद्भुत कवि हुआ। वह साधारण कवि न था, ऋषि था। उसने जाना था, वही गया था। और खूब गहराई से जाना था। उसके गुरु थे निजामुदीन औलिया, एक सूफी फकीर। निजामुदीन औलिया की मृत्यु हुई, तो हजारों भक्त आए। अमीर खुसरो भी गया अपने गुरु को देखने। लाश रखी थी, फूलों से सजी थी। अमीर खुसरों ने देखी लाश, और कहा:

'गौरी सोवत सेज पर मुख पर डारे केश। चले खुसरो घर आपने रैन भई यह देश।'

खुसरो ने कहा: 'गौरी सोवत सेज पर मुख पर डारे केश।' यह गोरी सो रही है सेज पर। मुख पर केश डाल दिए गए। 'चल खुसरो घर आपने'-अब यह वक्त हो गया, अब रोशनी चली गई इस संसार से, अब यहां सिर्फ अन्धकार है। 'चल खुसरो घर आपने रैन भई यह देश।' यह देश अब अंधेरा हो गया, रात हो गई।

और कहते हैं, यह पद कहते ही खुसरो गिर पड़ा और उसने प्राण छोड़ दिए। बस, यह आखिरी पद है, जो उसके मुंह से निकला। तुमने जिसे रोशनी जानी है, वह रोशनी नहीं है। खुसरो से रोशनी देख ली थी निजामुदीन औलिया की। उस रोशनी के जाते ही सारा देश अंधकार हो गया-रैन भई इस देश। चल खुसरो घर आपने। अब हम भी अपने घर चलें, अब वक्त-अब यहां कुछ रहें को बचा न।

खुसरो ने निजामुदीन औलिया में जीवन का दीया पहली-दफा देखा। जाना कि जीवन के है! पहचाना प्रकाश क्या है! होश में आया कि होना क्या है! उस दीये के बुझते ही उसने कहा: अब हमारे भी घर जाने का वक्त आ गया।

तुम जिसे अभी प्रकाश समझ रहे हो, वह प्रकाश नहीं है। और तुम जिसे अभी जल समझ रहे हो, वह जल नहीं है। और जिससे तुम अभी प्यास बुझाने की कोशिश कर रहे हो, उससे प्यास बुझेगी नहीं, बढ़े भला!

एक ही बात का ख्याल रखो और प्रतीक्षा करो कि उसका तीर तुम्हारे ह्रदय में बिंध जाए। और तुम्हारे नख से लेकर सर तक विरह की पीड़ा में तुम जल उठो। एक ही प्रार्थना हो तुम्हारी अभी, कि तेरा विरह चाहिए। तू बुला। तेरी पुकार चाहिए। एक ही प्रार्थना और एक ही भाव रह जाये कि उससे मिले बिना कोई सुख, कोई आनंद संभव नहीं है।

तो फिर देर न लगेगी बिना हाथों के, बिना प्रत्यंचा और तीर के-उसका तीर सदा ही तैयार है। सदा सधा है, तुम इधर ह्रदय खोलो, उधर से तीर चल पड़ता है। तुम इधर राजी होओ, उसकी पुकार आ जाती है। कहना मुश्किल है की पुकार पहले आती है कि तुम पहले राजी हो।
-ओशो
पिव पिव लगी प्यास
प्रवचन 9 से संकलित
सुकरात
सुकरात (469-399 ई. पू.) यूनान का विख्यात दार्शनिक। सुकरात को सूफियों की भांति मौलिक शिक्षा और आचार द्वारा उदाहरण देना ही पसंद था। वस्तुतः उसके समसामयिक भी उसे सूफी समझते थे। सूफियों की भांति साधारण शिक्षा तथा मानव सदाचार पर वह जोर देता था और उन्हीं की तरह पुरानी रूढ़ियों पर प्रहार करता था। वह कहता था, सच्चाज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुंच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।

बुद्ध की भांति सुकरात ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा। बुद्ध के शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही उपदेशों को कंठस्थ करना शुरु किया था जिससे हम उनके उपदेशों को बहुत कुछ सीधे तौर पर जान सकते हैं, किंतु सुकरात के उपदेशों के बारे में यह भी सुविधा नहीं। सुकरात का क्या जीवनदर्शन था यह उसके आचरण से ही मालूम होता है, लेकिन उसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न लेखक भिन्न-भिन्न ढंग से करते हैं। कुछ लेखक सुकरात की प्रसन्नमुखता और मर्यादित जीवनयोपभोग को दिखलाकर कहते हैं कि वह भोगी था। दूसरे लेखक शारीरिक कष्टों की ओर से उसकी बेपरवाही तथा आवश्यकता पड़ने पर जीवनसुख को भी छोड़ने के लिए तैयार रहने को दिखलाकर उसे सादा जीवन का पक्षपाती बतलाते हैं। सुकरात को हवाई बहस पसंद न थी। वह एथेंस के बहुत ही गरीब घर में पैदा हुआ था। गंभीर विद्वान् और ख्यातिप्राप्त हो जाने पर भी उसने वैवाहिक जीवन की लालसा नहीं रखी। ज्ञान का संग्रह और प्रसार, ये ही उसके जीवन के मुख्य लक्ष्य थे। उसके अधूरे कार्य को उसके शिष्य अफलातून और अरस्तू ने पूरा किया। इसके दर्शन को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहला सुकरात का गुरु-शिष्य-यथार्थवाद और दूसरा अरस्तू का प्रयोगवाद।

तरुणों को बिगाड़ने, देवनिंदा और नास्तिक होने का झूठा दोष उस पर लगाया गया था और उसके लिए उसे जहर देकर मारने का दंड मिला था।

ओशो कहते हैं: सुकरात को जहर दे कर मारा गया। अदालत ने सुकरात से कहा कि अगर तुम एक वचन दे दो कि तुम सत्य का प्रचार नहीं करोगे-जिसको तुम सत्य कहते हो, उसका प्रचार नहीं करोगे, चुप रहोगे-तो यह मृत्यु बचाई जा सकती है। हम तुम्हे माफ कर दे सकते हैं।

सुकरात ने कहा, जीवन को तो मैं देख चुका। सब कोनों से पहचान लिया। पर्त-पर्त उघाड़ ली। और अगर मुझे जीने का मौका दिया जाए, तो मैं एक काम के लिए जीना चाहूंगा कि दूसरे लोगों को भी जीवन का सत्य पता चल जाए। और तो अब कोई कारण न रहा। मेरी तरफ से जीवन का काम पूरा हो गया। पकना था, पक चुका। मेरी तरफ से तो मृत्यु में जाने में कोई अड़चन नहीं है। वस्तुतः मैं तो जाना चाहूंगा। क्योंकि जीवन देख लिया, मृत्यु अभी अनदेखी पड़ी है। जीवन तो पहचान लिया, मृत्यु से अभी पहचान नहीं हुई। जीवन तो ज्ञात हो गया, मृत्यु अभी अज्ञात है, रहस्यमय है। उस मंदिर के द्वार भी खोल लेना चाहता हूं। मेरे लिए तो मैं मरना ही चाहूंगा, जानना चाहूंगा-मृत्यु क्या है? यह प्रश्न और हल हो जाए। जीवन क्या है, हल हो चुका। एक द्वार बंद रह गया है; उसे भी खोल लेना चाहता हूं। और अगर मुझे छोड़ दिया जाए जीवित, तो मैं एक ही काम कर सकता हूं-और एक ही काम के लिए जीना चाहूंगा-और वह सत्य यह कि जो मैंने देखा है वह दूसरों को दिखाई पड़ जाए। अगर इस शर्त पर आप कहते हैं की सत्य बोलना बंद कर दूं तो जीवित रह सकता हूं, तो फिर मुझे मृत्यु स्वीकार है।

मृत्यु सुकरात ने स्वीकार कर ली। जब उसे जहर दिया गया, वह जहर पीकर लेट गया। मित्र रोने लगे शिष्य दहाड़ने लगे पीड़ा में; आंसुओं की धारें बह गई। सुकरात ने आंख खोलीं और कहा की यह वक्त रोने का नहीं। मैं चला जाऊं, फिर रो लेना। फिर बहुत समय पड़ा है। ये क्षण बड़े कीमती हैं। कुछ रहस्य की बातें तुम्हें और बता जाऊं। जीवन के संबंध में तुम्हें बहुत बताया, अब मैं मृत्यु में गुजर रहा हूं, धीरे धीरे प्रवेश हो रहा है। सुनो!

मेरे पैर ठन्डे हो गए हैं; पैर मर चुके हैं। जहर का प्रभाव हो गया। मेरी जांघ शून्य होती जा रही है। अब मैं पैरों का कोई अनुभव नहीं कर सकता, हिलाना चाहूं तो हिला नहीं सकता। वहां से जीवन विदा हो गया। लेकिन आश्चर्य! मेरे भीतर जीवन में जरा भी कमी नहीं पड़ी है। मैं उतना ही जीवित हूं। जांघें सो गई, शून्य हो गई।

सुकरात ने अपने शिष्य को कहा, क्रेटो, तू जरा चिउंटी लेकर देख मेरे पैर पर।

उसने चिउंटी ली।

सुकरात ने कहा, मुझे पता नहीं चलता। पैर मुर्दा हो गए। आधा शरीर मर गया। लेकिन मैं तो भीतर अभी भी पूरा का पूरा अनुभव कर रहा हूं! हाथ ढीले पड़ गए। हाथ उठते नहीं। गर्दन लटक गई। आखिरी क्षण में भी, आंख जब बंद होने लगी, तब भी उसने कहा कि मैं तुम्हें एक बात कहे जाता हूं, याद रखना: करीब-करीब सब मर चुका है, आखिरी किनारा रह गया है हाथ में, लेकिन मैं पूरा का पूरा जिंदा हूं, मृत्यु मुझे छू नहीं पाई है।

जिसने जीवन को जान लिया, वह मृत्यु को जानने को उत्सुक होगा। क्योंकि मृत्यु जीवन का दूसरा पहलू है; छिपा हुआ हिस्सा है। चांद की दूसरी बाजू है, जो कभी दिखाई नहीं पड़ती।
-ओशो
सब सयाने एक मत
प्रवचन-4 से संकलित
पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. एवम पुस्तक में उपलब्ध है

रहस्यदर्शियों की जीवन कथा
 
 
"जब किसी बुद्ध को उत्पन्न होना होता है, तो मां प्रभावित रहती है किन्हीं विशेष स्वप्नों द्वारा। क्योंकि हजारों बार यही स्वप्न फिर-फिर दोहराएं जाते हैं। इसका अर्थ होता है कि मां के भीतर की बुद्ध-चेतना एक निश्चित घटना निर्मित करती है उसके मन में और वह स्वप्न देखने लगती है एक विशेष आयाम के। उदाहरण के लिए बौद्ध कहते हैं कि जब कोई बुद्ध मां के भीतर होता है, तो मां स्वप्न देखती है सफेद हाथी का। यह एक प्रतीक है, किसी बहुत दुर्लभ चीज का प्रतीक- क्योंकि सफेद हाथी भारत की दुर्लभतम चीजों में से एक चीज है, करीब-करीब असंभव है उसे ढूढ़ निकालना। एक दुर्लभ प्राणी होता है गर्भ में और सफेद हाथी का प्रतीक मात्र एक संकेत है। और स्वप्नों की एक श्रृखंला पीछे-पीछे चली आती है।" -ओशो
दादू दयाल
कबीर की शिष्य परंपरा मे पांचवे राजस्थान के संत दादू संवत 1601 में अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर लोदीराम नाम के ब्राह्मण को पानी में बहते मिले थे। 11 की उम्र में श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हो गये। 13 साल में जब वे घर से भागे तो माता-पिता पकड़ कर वपास ले आये। लेकिन सात वर्ष बाद वे फिर भाग खड़े हुए और सागर पहुंच कर धुनिया का काम करने लगे।

वहीं 12 साल तक अध्ययन में करते रहे। उनके इस काम से कई ब्राह्मण खफा रहने लगे। एक बार जब दादू अपने घर में ध्यान लीन थे तो कुछ पंडितो ने ईर्ष्यावश उनके घर के द्वारों को ईटों से बंद करवा दिया था। जिसे बाद में उनके पड़ोसियों ने खोला। दादू ने कहा, अच्छा हुआ कि कृष्ण की उपासना करने का इतना शांत माहौल मिला। दयालु स्वभाव के होने के कारण दादू से संत दादूदयाल हो गये। मतलब दयालु संत। गुरु-कृपा से ज्ञान प्राप्त होने से इनके कई सैकडों शिष्य हो गए। जिनमें गरीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना मुख्य हैं। दादू हिन्दी, गुजराती, राजस्थानी आदि कई भाषाओं के ज्ञाता थे। इन्होंने शबद और साखी लिखीं। इनकी रचना प्रेमभावपूर्ण है। जात-पात के निराकरण, हिन्दू-मुसलमानों की एकता आदि विषयों पर इनके पद तर्क-प्रेरित न होकर हृदय-प्रेरित हैं।

प्रसिद्धि होने पर एक बार उन्हें अकबर बुलवाया और पूछा कि अल्लाह कि जाति क्या है ? इस पर दादू ने एक दोहा सुनाया-

इश्क अल्लाह की जाती है इश्क अल्लाह का अंग

इश्क अल्लाह मौजूद है, इश्क अल्लाह का रंग ।

कहा जाता है कि साधना के क्रम मे ही नाराना नगर कि भाराना पहाड़ी से वे गायब हो गए। आज भी उस पहाड़ी पर दादू के कपडे-किताबें आदि दादुपंथियो के पास हैं और उनकी एक समाधि भी है। दादू कि रचनाओं मे कबीर कि रचनाओं के कई अंश शामिल हैं।

दादू के बारें में सद्गुरु ओशो कहते हैं: मैं उसी को धार्मिक कहता हूं, जो न तो आस्तिक है, न नास्तिक है; खोजी है, यात्री है, जो कहता है, जीवन दांव पर लगा देंगे, लेकिन खोज कर रहेंगे। उसके जीवन में अंधेरे की प्रतीत हुई है। अब वह प्रकाश चाहता है। उसने प्यास को जाना है और जीवन के मरुस्थल को जाना है। वह मरूद्यान की खोज में है। वह किसी सरोवर की तलाश में है। और वह तलाश बौद्धिक नहीं है, उसका रोआं-रोआं प्यास से प्यासा है।

दादू उसी की बात कर रहे हैं। वे कहते हैं:

मन चित्त चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।

ऐसी बौद्धिक बातचीत से परमात्मा कुछ मिलेगा नहीं कि तुम बैठ कर गीता पढ़ लो, कि दर्शनशास्त्र का विचार कर लो; नहीं इससे कुछ न होगा।

मन चित चातक ज्यूं रटै, जैसे चातक चिल्लाता है रात भर-पिव पिव लागी प्यास! पियू पियू कहे चला जाता है। साधारण जल से राजी नहीं होता, स्वाति की बूंद की प्रतीक्षा करता है। वर्ष बिता देता है। दिन आते हैं, जाते हैं, चातक की रटन बढती चली जाती है।

चातक नाम का पक्षी केवल स्वाति नक्षत्र के पानी को ही पीता है। बाकी साल भर रोता रहता है। साधारण जल उसे तृप्त नहीं करता-स्वाति का परम जल चाहिये। संत साधारण जल से राजी नहीं-परमात्मा के जल से ही राजी है। साधारण प्रेम से उसे तृप्त नहीं कर पाता। जब तक परमात्मा की ही वर्षा उस पर न हो जाये, जब तक परम प्रेम न आ जाए तब तक वह प्यासा ही रहेगा।

मन चित चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।

बस उस प्यारे की ही प्यास लगी है। वही बुझा सकेगा।

दादू के शब्द बड़े महत्वपूर्ण हैं, वे कहते हैं, मन चित। मन के लिए भारत में बहुत शब्द हैं, ऐसा दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। अंग्रेजी में एक ही शब्द है-माइंड, लेकिन भारत में बहुत शब्द हैं। इसमें दो शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं दादू: मन, चित, चातक।

साधारण मन तो तुम्हारे पास है, चित तुम्हारे पास नहीं है। जब तक मन अँधेरे से राजी है तब तक वह चित नहीं है। जब मन चैतन्य की प्यास से भरता है और चैतन्य के आरोहण पर निकलता है; और जब कहता है चैतन्य होना है और चेतना है, जागना है, जागरण की अभीप्सा जब मन में पैदा होती है तब मन चित हो जाता है। तब मन साधारण मन न रहा। तब एक नई ही घटना घट गई। वह चैतन्य होने लगा।

मन साधारणतः अचित है, वह बेहोश है। तुम्हारा मन तो बिलकुल बेहोश है। तुम्हें पता नहीं तुम्हारा मन तुमसे क्या करवाता है। तुम करते रहते हो। जैसे कि कोई शराब के नशे में कर रहा है। किसी ने गाली दी, तुम्हें क्रोध आ गया। तुम कहते जरुर हो कि मैंने क्रोध किया, अब मैं क्रोध न करूंगा; लेकिन तुम गलत कहते हो। तुमने क्रोध किया नहीं। मन ने क्रोध करवा लिया। तुम मालिक नहीं हो। इसलिए तुम यह मत कहो कि मैंने क्रोध किया। अगर तुम करने ही वाले होते तब तो तुम्हारे बस में होता करते, या न करते। तुम मालिक नहीं हो।
-ओशो
पुस्तकः पिव पिव लागी प्यास से संकलित
संत सुन्दरदास
संत सुन्दरदासजी एक कवि ही नहीं बल्कि एक महान संत, धार्मिक एवं समाज सुधारक थे। उनका जन्म जयपुर राज्य की पुरानी राजधानी देवनगरी दौसा में भूसरगोत्र के खंडेलवाल वैश्य कुल में चैत्र शुक्ल नवमी संवत 1653 में हुआ। उनके पिता का नाम साहचोखा उमर नाम परमानंद तथा माता का नाम सती था। सुन्दरदासजी संत दादू के शिष्य थे। उन्होंने छोटी सी आयु में ही अपने गुरु से दीक्षा और आध्यात्मिक उपदेश प्राप्त कर लिया। संवत 1664 में जगजीवन जी दादू शिष्य रज्जबजी आदि के साथ काशी चले गए। काशी में रहकर उन्होंने संस्कृत, हिंदी व्याकरण, कोष शास्त्र, पुराण, वेदान्त का गहन अध्ययन किया।

संवत 1682 से जयपुर राज्य के शेखावटी प्रान्तवर्ती फतेहपुर में आये और वहां निवास किया। सुन्दरदास वहां योगाभ्यास कथा-कीर्तन तथा ध्यान आदि करते रहे। संत सुंदरदासजी का साहित्य सृजनकाल संवत 1664 से लेकर मृत्यु पर्यंत चलता रहा। सुंदरदासजी ने 42 मौलिक ग्रन्थ लिखे हैं, जो इनकी प्रखर प्रतिभा को उजागर करते हैं। ग्रंथों की भाषा सरल, सुबोध, स्पष्ट, सरस है।

ओशो कहते हैं: सुंदरदास थोड़े-से कलाकारों में एक है जिन्होंने इस ब्रह्म को जाना। फिर ब्रह्म को जान लेना एक बात है, ब्रह्म को जनाना और बात है। सभी जानने वाले जना नहीं पाते। करोड़ों में कोई एक-आध जानता है और सैकड़ों जाननेवालों में कोई एक जना पाता है। सुंदरदास उन थोड़े-से ज्ञानियों में से एक है, जिन्होंने निःशब्द को शब्द में उतारा; जिन्होंने अपरिभाष्य की परिभाषा की; जिन्होंने अगोचर को गोचर बनाया, अरूप को रूप दिया। सुंदरदास थोड़े-से सद्गुरूओं में से एक हैं। उनके एक-एक शब्द को साधारण शब्द मत समझना। उनके एक-एक शब्द में अंगारे छिपे है। और जरा-सी चिंगारी तुम्हारे जीवन में पड़ जाये तो तुम भी भभक उठ सकते हो परमात्मा से। तो तुम्हारे भीतर भी विराट का आविर्भाव हो सकता है। पड़ा तो है ही विराट, कोई जगाने वाली चिंगारी चाहिए।

चकमक पत्थरों में आग दबी होती है, फिर दो पत्थरों को टकरा देते हैं, आग प्रगट हो जाती है। ऐसी ही टकराहट गुरु और शिष्य के बीच होती हे। उसी टकराहट में ज्योति का जन्म होता है। और जिसकी ज्योति जली है वहीं उसको ज्योति दे सकता है, जिसकी ज्योति अभी जली नहीं है। जले दीये के पास हम बुझते दीये को लाते है। बुझे दीये की सामर्थ्य भी दीया बनने की है, लेकिन लपट चाहिए। जले दीये से लपट मिल जाती है। जले दीये का कुछ भी खोता नहीं है; बुझे दीये को सब मिल जाता है, सर्वस्व मिल जाता है।

यही राज है गुरु और शिष्य के बीच। गुरु का कुछ खोता नहीं है और शिष्य को सर्वस्व मिल जाता है। गुरु के राज्य में जरा भी कमी नहीं होती। सच पूछो तो, राज्य और बढ़ जाता है। रोशनी और बढ़ जाती है। जितने शिष्यों के दिए जगमगाने लगते हैं उतनी गुरु की रोशनी बढ़ने लगती है।

यहां जीवन के साधारण अर्थशास्त्र के नियम काम नहीं करते। साधारण अर्थशास्त्र कहता हैः जो तुम्हारे पास है, अगर दोगे तो कम हो जायेगा। रोकना, बचाना। साधारण अर्थशास्त्र कंजूसी सिखाता है, कृपणता सिखाता है। अध्यात्म के जगत में जिसने बचाया उसका नष्ट हुआ; जिसने लुटाया उसका बढ़ा। वहां दान बढ़ाने का उपाय है। वहां देना और बांटना-विस्तार है। वहां रोकना, संग्रहीत कर लेना, कृपण हो जाना-मृत्यु है।

इसलिए जिनके जीवन में रोशनी जन्मती है, वे बांटते हैं, लुटाते है। कबीर ने कहा हैः दोनों हाथ उलीचिए। लुटाओ! अनंत स्त्रोत पर आ गये हो, लुटाने से कुछ चुकेगा नहीं। और नयी धाराएं और नये झरने फूटते आएंगे। ऐसे एक ही ज्योति जल जाये तो अनेक की ज्योति जलती है। सुंदरदास के सत्संग में बहुमतों के दीए जले। ज्योति से ज्योति जले!

इन अपूर्व वचनों को ऐसे ही मत सुन लेना जैसे और बातें सुन लेते हो। और बातों की तरह सुन लिया तो सुना भी-और सुना भी नहीं। इन्हें तो गुनना! इन्हें सिर्फ कानों से मत सुनना! कानों के पीछे अपने ह्रदय को जोड़ देना, तो ही सुन पाओगे। सुनो तो जागना बहुत दूर नहीं है।

अनलिखे अक्षर बहुत
दीखे
बोल अनबोले बहुत
सीखे
भरे घट पाए कई
रीते
पनप भी पाए न हम
बीते!
अधिक लोग ऐसे ही जीते हैं।
पनप भी पाए न हम
बीते!
-ओशो
ज्योति से ज्योति जले
प्रवचन-9 से संकलित
अमीर खुसरो
खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम कवि अमीर खुसरो एक सूफीयाना कवि थे और ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के मुरीद थे। इनका जन्म सन् 1253 में हुआ था। इनके जन्म से पूर्व इनके पिता तुर्क में लाचीन कबीले के सरदार थे। मुगलों के जुल्म से घबरा कर इनके पिता अमीर सैफुद्दीन मुहम्मद हिन्दुस्तान आ गये थे और उत्तरप्रदेश के ऐटा जिले के पटियाली नामक गांव में जा बसे। इत्तफाकन इनका सम्पर्क सुल्तान शमसुद्दीन अल्तमश के दरबार से हुआ, उनके साहस और सूझ-बूझ से ये सरदार बन गए और वहीं एक नवाब की बेटी से शादी हो गई और तीन बेटे पैदा हुए उनमें बीच वाले अबुल हसन ही अमीर खुसरो थे। इनके पिता खुद तो खास पढे न थे पर उन्होंने इनमें ऐसा कुछ देखा कि इनके पढने का उम्दा इंतजाम किया। एक दिन वे इन्हें ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के पास ले गए जो कि उन दिनों के जाने माने सूफी संत थे।

मृत्यु- अमीर खुसरो किसी काम से दिल्ली से बाहर कहीं गए हुए थे वहीं उन्हें अपने ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के निधन का समाचार मिला। समाचार क्या था खुसरो की दुनिया लुटने की खबर थी। वे सन्नीपात की अवस्था में दिल्ली पहुंचे, धूल-धूसरित खानकाह के द्वार पर खडे हो गए और साहस न कर सके अपने पीर की मृत देह को देखने का। आखिरकार जब उन्होंने शाम के ढलते समय पर उनकी मृत देह देखी तो उनके पैरों पर सर पटक-पटक कर मूर्च्छित हो गए। और उसी बेसुध हाल में उनके होंठों से निकला,

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।

चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस।।

अपने प्रिय के वियोग में खुसरो ने संसार के मोहजाल काट फेंके। धन-सम्पत्ति दान कर, काले वस्त्र धारण कर अपने पीर की समाधि पर जा बैठे-कभी न उठने का दृढ निश्चय करके। और वहीं बैठ कर प्राण विसर्जन करने लगे। कुछ दिन बाद ही पूरी तरह विसर्जित होकर खुसरो के प्राण अपने प्रिय से जा मिले। पीर की वसीयत के अनुसार अमीर खुसरो की समाधि भी अपने प्रिय की समाधि के पास ही बना दी गई।

आज तक दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की समाधि के पास अमीर खुसरो की समाधि मौजूद है। हर बरस यहां उर्स मनाया जाता है। हर उर्स का आरंभ खुसरो के इसी अंतिम दोहे से किया जाता है - गोरी सोवे सेज पर।

ओशो कहते हैं: अमीर खुसरो एक बहुत अद्भुत कवि हुआ। वह साधारण कवि न था, ऋषि था। उसने जाना था, वही गया था। और खूब गहराई से जाना था। उसके गुरु थे निजामुदीन औलिया, एक सूफी फकीर। निजामुदीन औलिया की मृत्यु हुई, तो हजारों भक्त आए। अमीर खुसरो भी गया अपने गुरु को देखने। लाश रखी थी, फूलों से सजी थी। अमीर खुसरों ने देखी लाश, और कहा:

'गौरी सोवत सेज पर मुख पर डारे केश। चले खुसरो घर आपने रैन भई यह देश।'

खुसरो ने कहा: 'गौरी सोवत सेज पर मुख पर डारे केश।' यह गोरी सो रही है सेज पर। मुख पर केश डाल दिए गए। 'चल खुसरो घर आपने'-अब यह वक्त हो गया, अब रोशनी चली गई इस संसार से, अब यहां सिर्फ अन्धकार है। 'चल खुसरो घर आपने रैन भई यह देश।' यह देश अब अंधेरा हो गया, रात हो गई।

और कहते हैं, यह पद कहते ही खुसरो गिर पड़ा और उसने प्राण छोड़ दिए। बस, यह आखिरी पद है, जो उसके मुंह से निकला। तुमने जिसे रोशनी जानी है, वह रोशनी नहीं है। खुसरो से रोशनी देख ली थी निजामुदीन औलिया की। उस रोशनी के जाते ही सारा देश अंधकार हो गया-रैन भई इस देश। चल खुसरो घर आपने। अब हम भी अपने घर चलें, अब वक्त-अब यहां कुछ रहें को बचा न।

खुसरो ने निजामुदीन औलिया में जीवन का दीया पहली-दफा देखा। जाना कि जीवन के है! पहचाना प्रकाश क्या है! होश में आया कि होना क्या है! उस दीये के बुझते ही उसने कहा: अब हमारे भी घर जाने का वक्त आ गया।

तुम जिसे अभी प्रकाश समझ रहे हो, वह प्रकाश नहीं है। और तुम जिसे अभी जल समझ रहे हो, वह जल नहीं है। और जिससे तुम अभी प्यास बुझाने की कोशिश कर रहे हो, उससे प्यास बुझेगी नहीं, बढ़े भला!

एक ही बात का ख्याल रखो और प्रतीक्षा करो कि उसका तीर तुम्हारे ह्रदय में बिंध जाए। और तुम्हारे नख से लेकर सर तक विरह की पीड़ा में तुम जल उठो। एक ही प्रार्थना हो तुम्हारी अभी, कि तेरा विरह चाहिए। तू बुला। तेरी पुकार चाहिए। एक ही प्रार्थना और एक ही भाव रह जाये कि उससे मिले बिना कोई सुख, कोई आनंद संभव नहीं है।

तो फिर देर न लगेगी बिना हाथों के, बिना प्रत्यंचा और तीर के-उसका तीर सदा ही तैयार है। सदा सधा है, तुम इधर ह्रदय खोलो, उधर से तीर चल पड़ता है। तुम इधर राजी होओ, उसकी पुकार आ जाती है। कहना मुश्किल है की पुकार पहले आती है कि तुम पहले राजी हो।
-ओशो
पिव पिव लगी प्यास
प्रवचन 9 से संकलित
सुकरात
सुकरात (469-399 ई. पू.) यूनान का विख्यात दार्शनिक। सुकरात को सूफियों की भांति मौलिक शिक्षा और आचार द्वारा उदाहरण देना ही पसंद था। वस्तुतः उसके समसामयिक भी उसे सूफी समझते थे। सूफियों की भांति साधारण शिक्षा तथा मानव सदाचार पर वह जोर देता था और उन्हीं की तरह पुरानी रूढ़ियों पर प्रहार करता था। वह कहता था, सच्चाज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुंच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।

बुद्ध की भांति सुकरात ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा। बुद्ध के शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही उपदेशों को कंठस्थ करना शुरु किया था जिससे हम उनके उपदेशों को बहुत कुछ सीधे तौर पर जान सकते हैं, किंतु सुकरात के उपदेशों के बारे में यह भी सुविधा नहीं। सुकरात का क्या जीवनदर्शन था यह उसके आचरण से ही मालूम होता है, लेकिन उसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न लेखक भिन्न-भिन्न ढंग से करते हैं। कुछ लेखक सुकरात की प्रसन्नमुखता और मर्यादित जीवनयोपभोग को दिखलाकर कहते हैं कि वह भोगी था। दूसरे लेखक शारीरिक कष्टों की ओर से उसकी बेपरवाही तथा आवश्यकता पड़ने पर जीवनसुख को भी छोड़ने के लिए तैयार रहने को दिखलाकर उसे सादा जीवन का पक्षपाती बतलाते हैं। सुकरात को हवाई बहस पसंद न थी। वह एथेंस के बहुत ही गरीब घर में पैदा हुआ था। गंभीर विद्वान् और ख्यातिप्राप्त हो जाने पर भी उसने वैवाहिक जीवन की लालसा नहीं रखी। ज्ञान का संग्रह और प्रसार, ये ही उसके जीवन के मुख्य लक्ष्य थे। उसके अधूरे कार्य को उसके शिष्य अफलातून और अरस्तू ने पूरा किया। इसके दर्शन को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहला सुकरात का गुरु-शिष्य-यथार्थवाद और दूसरा अरस्तू का प्रयोगवाद।

तरुणों को बिगाड़ने, देवनिंदा और नास्तिक होने का झूठा दोष उस पर लगाया गया था और उसके लिए उसे जहर देकर मारने का दंड मिला था।

ओशो कहते हैं: सुकरात को जहर दे कर मारा गया। अदालत ने सुकरात से कहा कि अगर तुम एक वचन दे दो कि तुम सत्य का प्रचार नहीं करोगे-जिसको तुम सत्य कहते हो, उसका प्रचार नहीं करोगे, चुप रहोगे-तो यह मृत्यु बचाई जा सकती है। हम तुम्हे माफ कर दे सकते हैं।

सुकरात ने कहा, जीवन को तो मैं देख चुका। सब कोनों से पहचान लिया। पर्त-पर्त उघाड़ ली। और अगर मुझे जीने का मौका दिया जाए, तो मैं एक काम के लिए जीना चाहूंगा कि दूसरे लोगों को भी जीवन का सत्य पता चल जाए। और तो अब कोई कारण न रहा। मेरी तरफ से जीवन का काम पूरा हो गया। पकना था, पक चुका। मेरी तरफ से तो मृत्यु में जाने में कोई अड़चन नहीं है। वस्तुतः मैं तो जाना चाहूंगा। क्योंकि जीवन देख लिया, मृत्यु अभी अनदेखी पड़ी है। जीवन तो पहचान लिया, मृत्यु से अभी पहचान नहीं हुई। जीवन तो ज्ञात हो गया, मृत्यु अभी अज्ञात है, रहस्यमय है। उस मंदिर के द्वार भी खोल लेना चाहता हूं। मेरे लिए तो मैं मरना ही चाहूंगा, जानना चाहूंगा-मृत्यु क्या है? यह प्रश्न और हल हो जाए। जीवन क्या है, हल हो चुका। एक द्वार बंद रह गया है; उसे भी खोल लेना चाहता हूं। और अगर मुझे छोड़ दिया जाए जीवित, तो मैं एक ही काम कर सकता हूं-और एक ही काम के लिए जीना चाहूंगा-और वह सत्य यह कि जो मैंने देखा है वह दूसरों को दिखाई पड़ जाए। अगर इस शर्त पर आप कहते हैं की सत्य बोलना बंद कर दूं तो जीवित रह सकता हूं, तो फिर मुझे मृत्यु स्वीकार है।

मृत्यु सुकरात ने स्वीकार कर ली। जब उसे जहर दिया गया, वह जहर पीकर लेट गया। मित्र रोने लगे शिष्य दहाड़ने लगे पीड़ा में; आंसुओं की धारें बह गई। सुकरात ने आंख खोलीं और कहा की यह वक्त रोने का नहीं। मैं चला जाऊं, फिर रो लेना। फिर बहुत समय पड़ा है। ये क्षण बड़े कीमती हैं। कुछ रहस्य की बातें तुम्हें और बता जाऊं। जीवन के संबंध में तुम्हें बहुत बताया, अब मैं मृत्यु में गुजर रहा हूं, धीरे धीरे प्रवेश हो रहा है। सुनो!

मेरे पैर ठन्डे हो गए हैं; पैर मर चुके हैं। जहर का प्रभाव हो गया। मेरी जांघ शून्य होती जा रही है। अब मैं पैरों का कोई अनुभव नहीं कर सकता, हिलाना चाहूं तो हिला नहीं सकता। वहां से जीवन विदा हो गया। लेकिन आश्चर्य! मेरे भीतर जीवन में जरा भी कमी नहीं पड़ी है। मैं उतना ही जीवित हूं। जांघें सो गई, शून्य हो गई।

सुकरात ने अपने शिष्य को कहा, क्रेटो, तू जरा चिउंटी लेकर देख मेरे पैर पर।

उसने चिउंटी ली।

सुकरात ने कहा, मुझे पता नहीं चलता। पैर मुर्दा हो गए। आधा शरीर मर गया। लेकिन मैं तो भीतर अभी भी पूरा का पूरा अनुभव कर रहा हूं! हाथ ढीले पड़ गए। हाथ उठते नहीं। गर्दन लटक गई। आखिरी क्षण में भी, आंख जब बंद होने लगी, तब भी उसने कहा कि मैं तुम्हें एक बात कहे जाता हूं, याद रखना: करीब-करीब सब मर चुका है, आखिरी किनारा रह गया है हाथ में, लेकिन मैं पूरा का पूरा जिंदा हूं, मृत्यु मुझे छू नहीं पाई है।

जिसने जीवन को जान लिया, वह मृत्यु को जानने को उत्सुक होगा। क्योंकि मृत्यु जीवन का दूसरा पहलू है; छिपा हुआ हिस्सा है। चांद की दूसरी बाजू है, जो कभी दिखाई नहीं पड़ती।
-ओशो
सब सयाने एक मत
प्रवचन-4 से संकलित
पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. एवम पुस्तक में उपलब्ध है